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शीर्षक: इंद्राणी और रक्षा-सूत्र की पूरी कथा – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

 

बहुत प्राचीन समय की बात है। देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। असुरों की शक्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। देवताओं के राजा इंद्र अपनी पूरी सेना के साथ असुरों का सामना कर रहे थे, लेकिन युद्ध का पलड़ा धीरे-धीरे असुरों की ओर झुकने लगा।
देवताओं के लिए परिस्थिति अत्यंत कठिन हो गई। अनेक देवता घायल हुए और उन्हें अपनी हार का भय सताने लगा। स्वयं इंद्र भी चिंतित थे, क्योंकि सामने एक अत्यंत शक्तिशाली असुर सेना थी।
इंद्र की पत्नी इंद्राणी (शची) ने जब यह देखा तो वह बहुत चिंतित हुईं। उन्होंने अपने पति और समस्त देवताओं की रक्षा के लिए भगवान का स्मरण किया। उन्होंने देवताओं के गुरु बृहस्पति से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया।
बृहस्पति ने एक पवित्र रक्षा-सूत्र तैयार किया। मंत्रों और प्रार्थनाओं से पवित्र किए गए उस सूत्र को इंद्राणी ने श्रद्धापूर्वक अपने हाथ में लिया।
उन्होंने भगवान विष्णु और देवताओं की शक्ति का स्मरण करते हुए प्रार्थना की—
“हे प्रभु! इस पवित्र रक्षा-सूत्र की शक्ति से मेरे पति इंद्र और समस्त देवताओं की रक्षा हो। उन्हें धर्म की रक्षा करने का सामर्थ्य मिले और अधर्म पर विजय प्राप्त हो।”
इसके बाद इंद्राणी ने वह पवित्र रक्षा-सूत्र इंद्र की कलाई पर बाँधा।
वह धागा देखने में साधारण था, लेकिन उसके साथ आस्था, प्रार्थना और शुभकामना की शक्ति जुड़ी हुई थी।
इंद्र ने अपनी पत्नी का विश्वास देखा तो उनके मन में नया साहस आया। उन्हें लगा कि वे अकेले नहीं हैं। उनके पीछे उनके प्रियजनों का विश्वास, देवताओं का आशीर्वाद और धर्म की शक्ति है।
इसके बाद इंद्र ने अपनी सेना को संगठित किया और पूरी शक्ति से असुरों का सामना किया। युद्ध फिर से भयंकर हुआ। अंततः देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की।
इस घटना के बाद रक्षा-सूत्र को रक्षा, मंगलकामना और विजय का प्रतीक माना जाने लगा।
इसीलिए रक्षाबंधन के अवसर पर बाँधा जाने वाला धागा केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं माना जाता। उसके पीछे यह भावना भी है कि—
“जिसके हाथ में यह पवित्र सूत्र बाँधे, उसके जीवन में ईश्वर की कृपा, अपनों का विश्वास और सदैव रक्षा की भावना बनी रहे।”

सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर

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