लघुकथा- कच्चे धागों का अटूट बंधन-सुनीता तिवारी”सरस”

रक्षाबंधन आने वाला था। घर के आँगन में चहल-पहल थी, लेकिन रिया के मन में एक खालीपन था। उसका भाई रोहित शहर में नौकरी करता था और इस बार उसने फोन पर कहा था, “बहना, छुट्टी नहीं मिल रही। इस बार राखी डाक से भेज देना।”
रिया ने मुस्कुराकर हामी तो भर दी, मगर फोन रखते ही उसकी आँखें भर आईं। बचपन में दोनों एक-दूसरे से खूब लड़ते थे। कभी रोहित उसकी गुड़िया छिपा देता, तो कभी रिया उसकी किताबों पर फूल बना देती। माँ हमेशा कहतीं, “तुम दोनों का यह झगड़ा ही एक दिन सबसे मजबूत रिश्ता बनेगा।”
राखी के दिन रिया ने पूजा की थाली सजाई। रोहित की तस्वीर सामने रखी, माथे पर तिलक लगाया और राखी हाथ में लेकर कुछ क्षण चुप रही। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
“डाक आई है,” आवाज सुनाई दी।
लिफाफा खोलते ही रिया की आँखें चमक उठीं। उसमें राखी के साथ रोहित का छोटा-सा पत्र था,
“बहना, यह धागा भले ही कच्चा है, पर इसमें मेरा पूरा जीवन बँधा है। दूर हूँ, मगर तेरी हर खुशी के साथ हूँ।”
रिया ने राखी अपनी कलाई पर बाँध ली। तभी फोन बजा। रोहित वीडियो कॉल पर था।
“राखी बाँध ली?” उसने पूछा।
“हाँ, और तुम्हें भी।”
“मुझे कहाँ बाँधी?”
रिया हँस पड़ी, “दिल में।”
दोनों कुछ देर चुप रहे। आँखों में बचपन उतर आया।
उसी शाम माँ ने कहा, “रिश्ते दूरी से नहीं, विश्वास से जुड़े रहते हैं।”
रिया ने भाई का पत्र सीने से लगा लिया। उसे समझ आ गया कि राखी का धागा कलाई पर भले ही बँधता है, लेकिन उसका असली बंधन मन में होता है।
समय बदल सकता है, शहर बदल सकते हैं, परिस्थितियाँ बदल सकती हैं, लेकिन सच्चा भाई-बहन का प्रेम कभी नहीं बदलता।
वह कच्चे धागों का बंधन था, फिर भी जीवन की हर कठिन घड़ी से अधिक मजबूत था।
सुनीता तिवारी”सरस”
स्वरचित




