Uncategorized

लघुकथा : सच्चा पुरुषार्थ — पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर – गुजरात)

 

सिर्फ मेहनत करना ही सच्चा पुरुषार्थ नहीं है,बल्कि अपनी भीतर की शक्ति को पहचानना होगा। सही समय पर ही सही काम करना होगा। दूसरों की सहायता ही पुरुषार्थ है। हमें भाग्य के सहारे नहीं बैठना है। पुरुषार्थ ही भाग्य का दरवाजा खोलते है।
परिश्रम ही ऐसी कुंजी है है जो भाग्य को बदलती है। सच्चा पुरुषार्थ भाग्य को बनाने में सहायक होते हैं।राजेश और राकेश दोनों दोस्त थे। एक ही स्कूल में पढ़ते थे। राजेश पढ़ने में होशियार था बल्कि राकेश पहले से ही पढ़ने में कम ध्यान देता था। पढ़ने में कोई खास रस रुचि नहीं रखते थे।आलसी था।जब परीक्षा का परिणाम आता था तो कम मार्क्स मिलते थे। राकेश के माता पिता भी बहुत चिंतित होते थे।उसको समझाते;’राजेश, तुम्हारी उम्र पढ़ने की है पढ़ने में ध्यान दो अच्छे परिणाम के लिए सच्चा पुरुषार्थ बहुत जरूरी है। परिश्रम पारसमणी है। मेहनत बगैर कुछ भी नहीं मिलता।’ तेरे पिताजी खेत में कितनी कड़ी मेहनत करते हैं तभी खूब फसल ले सकते हैं। फिर भी राजेश में कोई फर्क नहीं पड़ता था।माता पिता बहुत चिंतित होते थे। राजेश दशवीं कक्षा तक पहुंच गया। दसवीं कक्षा में ना पास हुआ। दो बार परीक्षा दी। राकेश दसवीं कक्षा में से निकल नहीं सकता था।राकेश बहुत हताश हो गया। उसका मित्र राजेश ने समझाने की कोशिश की;’राजेश अभी तेरे पास समय है कुछ बिगड़ा नहीं है‌‌।’ मेहनत कर सच्चा पुरुषार्थ अच्छा परिणाम देगा। हिम्मत नहीं हारना। हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा। गीता में कृष्ण भगवान ने भी कहा है;’कर्मणे वा धिकारास्ते माफलेषु कदाचन’ कर्म करने में विश्वास रख। कर्म करेगा तो फल तो अवश्य मिलेगा ही। ‌अडिग मन से पुरुषार्थ सफलता दिलाएंगे। पहले ध्येय तय करना। ध्येय प्राप्ति के सही पुरुषार्थ करना। परिश्रम रंग लाता ही है।
राकेश की बात राजेश की समझ में आ गई। मन में उतर गई। राजेश ने तय किया कुछ भी हो जाए दसवीं कक्षा में अच्छे मार्क्स लाना ही है। उसने रात दिन एक करके कड़ी मेहनत की। दसवीं कक्षा में अच्छे मार्क आया।उसके माता पिता भी खुश हुए‌।
अगर आप जीवन में बदलाव चाहते हैं तो लड़ना पड़ता है।समस्याओं से बधाओं से यहाँ तक कि कभी कभी लोगों से भी अगर जीवन को आसान बनाना है तो समझना पड़ता हैं।आसान कुछ भी नहीं है परन्तु कोशिश करने वालों के लिए मुश्किल कुछ भी नहीं है। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।जैसे हीरे को या किसी भी रत्न को सुन्दर बनाने के लिए उसे बार बार घिसा जाता है।तराशा जाता है। ठीक वैसे ही हमारा व्यक्तित्व भी समस्याओं का सामना मजबूती से करके निखर जाता है और हमारी एक अलग पहचान होती है।

“एकाग्र होकर पाता है नियमित स्वाध्याय,
वही लिख पाता है जीवन का सुनहरा अध्याय।”

श्री पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर – गुजरात)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!