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कर्मा वाई और खीचड़ी — उर्मिला पाण्डेय उर्मि कवयित्री मैनपुरी उत्तर प्रदेश

 

यह बात बहुत प्राचीन समय की है जगन्नाथ मंदिर में एक पुजारी पूजा किया करते थे वह भगवान की हरदम तन मन धन से सेवा करते थे जगन्नाथ भगवान के चरणों में सिर नवाकर प्रणाम करते समय पर उनका पर्दा डाल देते थे तरह तरह के भोग लगाया करते थे उनका मानना था कि भगवान को जितना अच्छा भोग लगाओगे उनकी सेवा करोगे वह सब तुम्हें मिलेगा भगवान तुम्हारे ऊपर कृपा करेंगे।
इसी प्रकार भगवान की सेवा में बहुत समय व्यतीत हुआ।
एक दिन पुजारी जी अपने गांव गये कर्मा वाई से कहा कि मैं शाम को आ जाऊंगा भगवान को भोग लगाना उनकी पूजा अर्चना करना। पुजारी जी के जाने के बाद कर्मा वाई ने भगवान को नहलाया मंदिर की सफाई की ध्यान रहे कि उस समय कर्मा वाई की आयु मात्र नौ बर्ष की थी। सच्चा प्रेम था भगवान के भोग लिए क्या बनाऊं कौन सी चीज जल्दी बन जाएगी उन्होंने सोचा की खिचड़ी जल्दी बन जाएगी इसके साथ कुछ भी बनाने की जरूरत नहीं कर्मा वाई ने खिचड़ी बनाई जिस प्रकार उनके बाबा भोग लगाते थे उसी प्रकार भोग लगाया बाबा की तरह पर्दा डाला उन्हें यह नहीं पता कि भगवान सचमुच में खाते हैं कि नहीं बैठ गईं खिचड़ी का भरा थाल लेकर और कटोरी में ऊपर से घी रखकर भगवान खाओ भोग लगाओ आओ जल्दी आओ। भगवान नहीं आए तो बोलीं आप नहीं खाओगे तो मैं भी नहीं खाऊंगी भूखी ही रहूंगी, भगवान से निष्काम प्रेम कोमल हृदय कर्मा वाई ने भगवान से कहा कि मेरे बाबा पता नहीं कब तक आएंगे आप खिचड़ी खाइए। नहीं तो भूखे ही बने रहोगे।
मैं कल अवश्य ही रबड़ी बनाऊंगी उसी का भोग लगाऊंगी।
भगवान जगन्नाथ को एक नौ बर्ष की बालिका की भक्ति प्रेम के आगे प्रकट होना पड़ा भगवान मूर्ति में से प्रकट होकर खिचड़ी खाने लगे और कर्मा बाई की गोद में बैठकर कर्मा को भी खिलाने लगे।शाम को जब बाबा आए उन्होंने पूछा बेटी पूजा की थी भगवान को कुछ खिलाया था कर्मा वाई ने सारी बात बात बता दी यह सुनकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि मैं इतने समय से भगवान की सेवा पूजा कर रहा हूं मुझे अभी तक भगवान जगन्नाथ के दर्शन नहीं हुए धन्य है कर्मा की भक्ति इतनी कम उम्र में तभी से जगन्नाथ भगवान को खिचड़ी का भोग नित्यप्रति लगाया जाता है सुबह-सुबह खिचड़ी का बिना नहाए भोग लगाया जाता है।
कर्मा वाई वहां सेवा करतीं थीं जब उनकी शादी हो गई तो जहां पर रहतीं थीं वहां भी भगवान जगन्नाथ की पूजा करतीं थीं और खिचड़ी का भोग लगातीं सुबह सुबह बिना नहाए धोए भगवान खाने आते थे वह समझतीं थीं कि भगवान को जल्दी भूख लगती है खिचड़ी का भोग लगाकर और सभी काम करतीं थीं।
एक दिन कुछ साधु महात्मा उन्हें मिले उनमें से एक जगन्नाथ मंदिर के पुजारी भी थे। उन्होंने पूछा माता भगवान की पूजा कैसे करती हो कर्मा ने कहा मेरे भगवान को जल्दी भूख लगती है मैं सुबह सुबह बिना नहाए धोए खिचड़ी बनाती हूं भगवान आकर खाते हैं।बाद में सभी काम करके फिर भगवान की पूजा करके उन्हें जो बनाती हूं उसका भोग लगातीं हूं।
महात्मा बोले माता आप ये क्या करतीं हैं भगवान को बिना नहाए धोए भोग लगातीं है स्नान करने के बाद बनाया करो।
दूसरे दिन से कर्मा वाई जल्दी उठतीं और नहाने के बाद खिचड़ी बनाने लगीं अब थोड़ी देर हो जाती भगवान ने कहा माता अब उतना खिचड़ी में स्वाद नहीं आता मुझे बहुत जोर से भूख लगती है दूसरे दिन कर्मावती ने खिचड़ी बनाई भगवान खा रहे थे पानी नहीं पी पाया मुंह में खिचड़ी लगी थी उसी समय जगन्नाथ मंदिर के पुजारी ने घंटा बजा दिया भगवान तुरंत चले गए पुजारी ने मंदिर खोला तो देखा कि जगन्नाथ भगवान के मुंह में खिचड़ी लगी हुई थी।
यह देखकर पुजारी को बड़ा आश्चर्य हुआ धन्य है कर्मा वाई की निष्काम प्रेम भक्ति उसके आगे मेरी भक्ति कुछ भी नहीं वह दौड़कर कर्मा वाई के पास गए चरण स्पर्श किए और कहा माता आपकी भक्ति श्रेष्ठ है आप जैसे पहले पूजा करतीं थीं उसी प्रकार करो।अब इस मंदिर में रोज़ सुबह सुबह तुम्हारे बाद भी खिचड़ी का ही भोग लगाया जाएगा आज भी जगन्नाथ मंदिर मंदिर में चाहे कोई दिन कोई तिथि एकादशी ही क्यों न हो खिचड़ी का ही भोग लगता है।
धन्य है कर्मा वाई की भक्ति जो खिचड़ी का एक नियम बन गया भगवान भी स्वयं आकर खिचड़ी खाते थे।
जय जगन्नाथ
उर्मिला पाण्डेय उर्मि कवयित्री मैनपुरी उत्तर प्रदेश।

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