संस्मरण। वह इंसान फरिश्ता। — रिंकी माथुर

मेरा परिवार सर्दियो की छुट्टी में मुंबई जाने का प्रोग्राम बनाया मुंबई में हमारे रिश्तेदार रहते हैं तो बच्चों को घुमा कर लेंगे ऐसा सोचकर हम लोग मुंबई के लिए निकल पड़े।
मेरे हस्बैंड ने नॉन एसी का रिजर्वेशन कराया था और उन्होंने मुझे यह नहीं बताया कि उसे ट्रेन में हमें कंबल ,चादर ओढने को मिलेंगे।
मैं मेरे दो बच्चे और हस्बैंड हम लोग स्टेशन के लिए निकल पड़े और अपने डिब्बे में हम लोग चले गए मैंने देखा कि हमारा डिब्बा ए सी नही है तो ओढने और बिछाने को कुछ नही मिलेगा मुझे बडी चिन्ता हुई और पतिदेव पर बहुत गुस्सा भी आया,लेकिन अब कर भी क्या सकते थे ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ने वाली थी और मैं इसी चिंता में थी कि राजस्थान से मुंबई तक तो ठंड होगी मुंबई में ठंड नहीं होती है पूरी रात बच्चे ठंड से बीमार ना हो जाए और मैंने कुछ ओढने और बिछाने को कुछ नही लिया था कि ट्रेन मे सब मिलेगा मै अपने पति से यही बात कर रही थी कि आपने पहले क्यू नही बताया अब क्या करेंगे।
इतने में सामने की बर्थ पर एक 50 वर्षीय लेडी बैठी यह सब देखकर सुन रही थी उन्होने हमसे कहा कि आप चिन्ता मत करे और उन्होने अपने एक छोटे से बैग से मेरे दोनो बच्चो को कंबल दिये,मेरे पतिदेव को चादर मुझे कंबल दिया।
मुझे सिर पर लगाने के लिये स्कार्फ दिया और हमारी रात बडे आराम से निकल गई।
मैने सुबह सब चीजे वापस करी और मै वाशरूम गई, वापस आई तो देखा वो महिला वहा नही थी सबसे पूछा तो किसी को पता नही कि वो कहा उतर गई।
मैने अच्छे से उन्हे धन्यवाद भी नही दिया लेकिन मै आज भी सोचती हूँ तो विश्वास नही होता कि कौन थी, मेरे लिये तो वो एक भगवान का भेजा फरिश्ता थी।
रिंकी माथुर




