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संतोष – सबसे बड़ा धन — मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

 

गो-धन, गज-धन, वाजि-धन और रतन-धन खान।
जब आवत संतोष-धन, सब धन धूरि समान॥

यह दोहा मनुष्य जीवन की एक गहरी सच्चाई को सरल शब्दों में व्यक्त करता है। संसार में लोग धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा पाने के लिए निरंतर भागते रहते हैं,परंतु सच्चा सुख इन सबमें नहीं, बल्कि संतोष में छिपा होता है। जिस व्यक्ति के मन में संतोष का भाव होता है, वह सीमित साधनों में भी आनंदपूर्वक जीवन जी लेता है।
संतोष का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य प्रयास करना छोड़ दे, बल्कि इसका अर्थ है–जो प्राप्त है, उसे स्वीकारते हुए कृतज्ञता और शांति के साथ जीना। जब मन संतोष से भरा होता है, तब साधारण दाल-रोटी भी अमृत के समान लगती है। वह भोजन केवल पेट ही नहीं भरता, बल्कि मन को भी तृप्त कर देता है। उस समय व्यक्ति के भीतर कोई अभाव या शिकायत नहीं रहती। इसके विपरीत, यदि मन में संतोष नहीं है, तो चाहे सामने छप्पन भोग ही क्यों न सजे हों, फिर भी तृप्ति नहीं मिलती। लालसा और असंतोष मनुष्य को निरंतर बेचैन रखते हैं। वह जो मिला है, उसका आनंद लेने के बजाय हमेशा उस चीज़ के पीछे भागता रहता है जो उसके पास नहीं है। परिणामस्वरूप सुख और शांति उससे दूर होते जाते हैं।
आज के समय में भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ी हैं, परंतु मनुष्य का संतोष कम होता जा रहा है। अधिक पाने की दौड़ में लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि सुख वस्तुओं की अधिकता से नहीं, बल्कि मन की संतुलित अवस्था से आता है। यदि मन संतुष्ट है, तो छोटी-सी झोंपड़ी भी महल जैसी लग सकती है; और यदि मन असंतुष्ट है, तो महल में रहकर भी व्यक्ति खालीपन महसूस करता है।
भारतीय दर्शन में संतोष को एक महान गुण माना गया है। संत और महात्मा सदा यही संदेश देते आए हैं कि संतोष ही वास्तविक समृद्धि है। यह मन को स्थिर करता है, रिश्तों में मधुरता लाता है और जीवन को सरल बना देता है।
अंततः यही कहा जा सकता है कि मनुष्य के लिए सबसे बड़ा धन संतोष ही है। जब यह धन मन में आ जाता है, तब बाकी सभी संपत्तियाँ तुच्छ प्रतीत होने लगती हैं। इसलिए हमें जीवन में प्रयास करते हुए भी अपने भीतर संतोष का दीप जलाए रखना चाहिए, क्योंकि वही सच्चे सुख और शांति का मार्ग है।

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

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