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“देखो सुनो चुप रहो” — विनोद कुमार शर्मा

लोकतांत्रिक देश में जनतांत्रिक मूल्यों-मान्यताओं को सहज ही स्वीकारने की सुन्दर भावपूर्ण प्रवृत्ति पाई जाती
गणतंत्रीय व्यवस्था में समय समय पर सुविधानुसार बहुमत के आधार पर संविधान में सैकड़ों संसोधन हुए लेकिन
आई पी सी को BNS भारतीय न्याय संहिता के रूप में लाया गया 77 वर्षों में अभी तक कुल 106 संशोधन हो चुके लेकिन न्याय पालिकाओं के कानून कमजोर और लचर बने हैं
दुष्कर्म भ्रष्टाचार देशद्रोही गतिविधियों पर कानून और सख्त होना एवं समयबद्ध समयावधि के अन्दर फैसला होना अति आवश्यक है जो कि नहीं हो रहे इसीलिए इसप्रकार के अपराधों में कमी नहीं आ रही
इसी तारतम्य में अपराध हुआ तो अपराधी को सजा का प्रतिशत 99% होना चाहिए नहीं सजा मिलती तो विवेचना एजेंसियों की जवाबदेही उनको भी कठोर दंड मिलना सुनिश्चित किया जाना चाहिए झूठी गवाही और गबाहों को अंतिम समय पलटने में भी कठोर सजा निर्धारित हो देरी से न्याय का मतलब तो अन्याय ही हुआ जजों की पोस्टें बढ़ाना लम्बित प्रकरणों की समयावधि में निर्णय अनिवार्य बनाया जाय तो सच्चा लोकप्रिय लोकतान्त्रिक व्यवस्था न्याय व्यवस्था का भरोसा मजबूत होगा l
कुछ व्यवहारिक संविधान संशोधन भी होना चाहिए परम पिता परमेश्वर या जगत जननी माता रानी दुर्गा माँ हैं लेकिन कोई भी किसी राष्ट्र का पिता कैसे हो सकता जबकि हमारे देश में राष्ट्रपिता शब्द उपयोग में है इसके लिए कोई सुन्दर उपयोगी शब्द खोजा जा सकता है ठीक इसी प्रकार राष्ट्र माता की माँग होने पर क्या उपाय किए जा सकते किए जाएंगे प्रश्न उठते हैं
कोई किसी राष्ट्र का पति राष्ट्रपति कैसे हो सकता और राष्ट्र पति हो सकता तो राष्ट्र पत्नि पर भी सवाल उठता है जब महिला सर्वोच्च पद पर हो तो उसे पुल्लिंग शब्द राष्ट्रपति से पुकारना अव्यवहारिक लगता नजर आता राष्ट्राध्यक्ष जैसे कोई सार्थक नामावली अभी तक हमारी संसद खोजने में रुचि क्यों नहीं लेती
विनोद कुमार शर्मा

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