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संस्मरण — कविता साव पश्चिम बंगाल

गर्मियों की दोपहर जैसे ही आँगन में उतरती थी, मेरा मन चुपके से उसी ओर भाग जाता—वो बगीचे आम के। गाँव के बाहर, कच्ची पगडंडी के उस पार फैला वह हराभरा संसार, जहाँ पेड़ों की कतारें किसी सुरीले गीत-सी दूर तक लहराती थीं। पत्तों के बीच से छनती धूप ज़मीन पर जैसे रंगोली बिछा देती, और हवा में घुली कच्चे आम की खुशबू मेरे मन को अनायास ही महका देती।
मैं और मेरी सहेलियाँ उस बगीचे को अपनी छोटी-सी दुनिया मानती थीं। दुपट्टे सँभालती, आँखों में शरारत छुपाए, हम पेड़ों के नीचे जाकर खड़ी हो जातीं। कभी हौले से डाल हिलाने की कोशिश, कभी पत्थर से निशाना लगाने की नादान कोशिश—और जब कोई आम “टप” से गिरता, तो जैसे हमारी खुशी का ठिकाना ही न रहता। हम हँसतीं, दौड़तीं, और उस एक आम में जाने कितनी जीत समेट लेतीं।
मालिक का डर भी उस खेल का हिस्सा था। उसकी आहट मिलते ही हम दुपट्टा संभालकर भागतीं, साँसें तेज़ हो जातीं, पर होंठों पर हँसी थमती ही नहीं थी। थोड़ी दूर जाकर रुकतीं, एक-दूसरे को देखतीं और खिलखिलाकर हँस पड़तीं—वो मासूमियत, वो निश्चिंतता आज भी मन में वैसे ही बसी है।
घर लौटते समय दुपट्टे की ओट में छुपाए हुए कच्चे आम, और साथ में नमक-मिर्च की छोटी-सी डिबिया—हम कहीं पेड़ की छाँव में बैठ जातीं। एक कौर में खट्टापन, दूसरे में हँसी, और हर निवाले में अपनापन घुला रहता। उन पलों में जैसे दुनिया बहुत छोटी और बहुत प्यारी लगती थी।
आज जब आईने में खुद को देखती हूँ, तो लगता है समय कितनी दूर ले आया है। वो बगीचे अब शायद पहले जैसे नहीं रहे, पर उनकी हरियाली अब भी मेरे भीतर साँस लेती है। पत्तों की सरसराहट, आमों की महक, और सहेलियों की हँसी—सब कुछ मेरी स्मृतियों में आज भी वैसे ही जीवंत है।
सच तो ये है—वो बगीचे आम के अब बाहर कहीं नहीं, मेरे मन के आँगन में बसते हैं। हर गर्मी में, हर याद में, वो फिर से हरे हो जाते हैं… और मैं फिर से वही निश्चिंत, चंचल-सी लड़की बन जाती हूँ।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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