हाय रे गर्मी जान लेती गर्मी — कृत्या नंद झा अमृत राँची

ना दिन में चैन, न रात में नींद। पानी से पेट भरे रहता है, किंतु प्यास तो बुझती ही नहीं है। आखिर जियें तो कैसे…बुढ़ा हेमू अपने मित्र शेखु को कह रहा था। शेखु ने उबासी लेते हुए कहा- हाँ भाई! बात तो सोलह आने सच है I लगता है सूर्य देव का प्रकोप बढ़ गया है। लोग उन्हें मनाने यज्ञ, कीर्तन, रामधुन आदि का आयोजन करें..तभी भला होगा। हेमू ने कहा- भाई वर्षा कराने का काम तो इन्द्रदेव का है..गुहार लगानी है तो उनकी करो।
यह सब बातें हेमू का कक्षा पाँच में पढ़ने वाला पोता कानन कुमार सुन रहा था ,उसने कहा – दादा इसमें ना सूरज की ना इन्द्रदेव का कोई दोष है। बल्कि विकास के अंधे दौर में मानव ही बेहोश है। नित लाखों पेड़ काटकर चंद गमलों में दो चार फूल लगाते हैं और खुद को भरमाते हैं। कल कारख़ाने और गाड़ियां रक्तबीज की तरह बढ़ रही है। आखिर उसने उत्सर्जित उष्मा से वातावरण तो गर्म होगा ही। देश पक्के निर्माण के धोखे में जमीन का पक्कीकरण हो रहा है, जिसने वह तबे की तरह गर्म होकर उष्मा विकिरित कर वायुमंडल को गर्म कर रहा है। फिर हम क्यों ना कहें – हाय रे गर्मी जान लेती गर्मी।
बात इतनी ही नहीं है…
हम जो बोये है, वही काट रहे हैं ,
लोभ किए काटे थे अनगिनत पेड़-
अब खुद का पसीना चाट रहे हैं।
सदा सलीला नदियाँ अब नाले का आकार ले चुकी है। अतिक्रमण के कारण किनारे पर भवन और तटबंधों का पक्कीकरण बाँझ के कोख में खाज का काम कर रही है। नदियों की ओर से शीतल हवा अब जमीन तक पहुँच ही नहीं पाती हैं। और इस सबका जिम्मेदार धरती का सबसे बुद्धिमान जीव मानव है। और यही कहता है- हाय रे गर्मी जान लेती गर्मी…..।
हेमू ने घर बनाने में चालीस पेड़ काटे थे और शेखु ने साठ। हेमू के आँगन में सिर्फ एक आम का पेड़ है और शेखु के आँगन में एक अमरूद का। चिलचिलाती धूप में वे वहीं आश्रय लेते हैं।
कानन कुमार की बातें सुनकर दोनों को अपने गलती का एहसास हुआ है। आज वे एक नारा देते हुए पर्यावरण सेवक बनकर कार्य करते हैं और नारा देते हैं…
छोड़कर बेशर्मी सब पेड़ लगाओ ,
जान लेवा गर्मी से खुद को बचाओ ।
कृत्या नंद झा अमृत
राँची



