कहानी — भीड़ में अकेला _ मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’ कार्यकारी संपादक

आयुष भी उन लाखों युवाओं में से एक था, जिनकी ज़िन्दगी बाहर से चमकती हुई दिखती है, लेकिन भीतर कहीं गहरी खामोशी पल रही होती है।
स्कूल तक सब ठीक था। वह होशियार था, खेलता भी था, दोस्तों के साथ हँसता भी…लेकिन जैसे ही उसने कॉलेज में कदम रखा, दुनिया अचानक बदल गई। अब हर कोई आगे निकलने की होड़ में था। हर किसी के पास एक लक्ष्य था। इंजीनियर बनना, डॉक्टर बनना, या कुछ बड़ा कर दिखाना।
आयुष का भी एक सपना था, लेकिन वह उसका अपना कम और समाज का ज्यादा था। वह समाज को एक नई दिशा देना चाहता था। वहीं से शुरू हुआ घर के लोगों का दवाब।
आयुष मन लगाकर पढ़ना तुम्हें भी कुछ बनना है।
”देख शर्मा जी का बेटा IIT में है…वगैरह वगैरह…”
ऐसी बातें रोज़ उसके कानों में गूंँजने लगी । रोज वही बात सुन सुनकर… आयुष ने खुद की तुलना दूसरों से करनी शुरू कर दी। जब भी वह सोशल मीडिया खोलता, उसे लगता जैसे हर कोई उससे बेहतर है। किसी के मार्क्स अच्छे हैं,किसी की शानदार लाइफ स्टाइल तो किसी की परफेक्ट तस्वीरें। ये सब देखकर वह सोचने लगा।
”शायद मैं ही पीछे रह गया हूँ…”
यह सोच अब उसके ऊपर हावी होने लगी थी। इसी बीच एग्जाम में उसके नंबर उम्मीद से कम आए। घर में ज्यादा कुछ नहीं कहा गया, लेकिन जो नहीं कहा गया…वही उसे सबसे ज्यादा चुभ गया। माँ की चुप्पी…पिता की हल्की-सी निराशा
आयुष ने उस दिन खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया। अब उसने दोस्तों से मिलना और घर में सबसे बात करना कम कर दिया। फोन पर ऑनलाइन जरूर रहता, लेकिन असल जिंदगी में ऑफलाइन हो गया था। रात-रात भर जागना,छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन,खुद पर शक करना,ये सब उसकी आदत बन गई। सबको लगता,वह ठीक है। क्योंकि वो दिखाता भी यही था और चुपचाप भीतर कुछ धीरे-धीरे दवा-सा निगल रहा था। न बिमारी का पता चल रहा था और न खुद के खालीपन का…उसी बीच एक दिन, कॉलेज में उसकी क्लासमेट रिया ने उसे गौर से देखा और
पूछा,”तू ठीक है आयुष…?
उसने नजरें झुकाते हुए हल्के से कहा,हाँ मैं ठीक हूँ मुझे क्या हुआ है।” वह बहुत ही सहजता से बोली, बड़े दिनों से मैं तुझे देख रही हूंँ…”तू ठीक नहीं है, आयुष…”
आयुष ने हँसकर टालना चाहा-“अरे, ऐसा कुछ नहीं है।”
रिया ने कहा-“हर बार ‘कुछ नहीं’कहने से सब ठीक नहीं हो जाता। मुझे बता क्या बात है?”
उसकी बातों से आयुष के दिल में जो भारीपन था। वह खामोशी में बदल गया। कुछ देर की खामोशी के बाद, आयुष बोला-
”मुझे लगता है रिया मैं सबकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहा…” यही शब्द उसकी अंदर की पीड़ा कह गए जो रिया ने महसूस किया। रिया ने धीरे से कहा…
”और तुम खुद की उम्मीदों पर?”आयुष चुप हो गया। शायद किसी ने पहली बार उससे ये सवाल पूछा था। उस दिन वह दोनों बहुत देर तक बातें करते रहे। रिया ने उसे समझाया कि-जिन्दगी कोई प्रतियोगिता नहीं है और न सोशल मीडिया पूरी तरह सच है । ये सिर्फ एक हिस्सा है और सबसे जरूरी बात सुन…अपने मन की बात किसी अपने से कहना कमजोरी नहीं, हिम्मत है। कुछ दोस्तों से मन की बात कर लेनी चाहिए। आयुष, “एक बात और कहना चाहूंँगी माता-पिता से बड़ा दोस्त कोई नहीं होता। आयुष ने हांँ में सिर हिला दिया और दोनों चल पड़े अपने-अपने गंतव्य की और…रिया बस में बैठी यही सोचती रही आयुष को इस उलझन से निकालना होगा। इतिहास अपने पन्ने दोहराये उससे पहले…यह विचार आते ही उसकी आंँखों में नमी उतर आई। वह उसी वक्त सीधे आयुष के घर पहुंँच गई। आंटी ने दरवाजा खोला और उसे देख गले से लगा लिया। “कैसी हो रिया?”
हांँ,”अच्छी हूंँ आंटी”–”आप दोनों ठीक हो”?
रिया ने कहा, आंटी मैं आप दोनों से आयुष के बारे में कुछ बातें करने आई हूँ । वह आजकल बड़ा चुप-चुप रहने लगा है और अकेलेपन का शिकार होते जा रहा है। आप उससे बातें करें, प्रेम करें और गले से लगाएं।
आप तो जानती हैं ना आंटी, “मैंने अपने भाई को खोया हैं। हम समझ ही नहीं पाए वो किस परिस्थिति से गुजर रहा था। और उसने अपने आपके साथ हम लोगों को भी जिंदगी की सजा सुना दी।…तभी रिया की आँखें भर आई। आंटी मैं नहीं चाहती आयुष भी अपने आपको……
तभी आयुष की मम्मी ने उसे गले से लगा लिया। तुम चिंता मत करो बेटा, हम ऐसा कुछ नहीं होने देंगे। अब तुम बेफिक्र होकर घर जाओ।
तबसे आयुष की मम्मी का मन जोर से धड़कने लगा। ये कैसे हो गया मैं माँ होकर भी अपने बच्चे को समझ नहीं पाई।
तभी आयुष दरवाजे से अंदर आता हुआ दिखाई दिया तो
मांँ ने उसे कसकर गले से लगा लिया। मुझे माफ कर दे मेरे बच्चे मैं तुझे समझ नहीं पाई। आयुष को पास में बैठाते हुए उसे खूब प्यार से समझाया और अपने अंक में भरते हुए प्यार से आसवासन दिया हम तेरे साथ है। तभी धीरे-धीरे आयुष ने अपने माता-पिता से सारी परेशानी खोल दी
शुरुआत में उन्हें समझने में समय लगा, लेकिन फिर उन्होंने महसूस किया हमारा बेटा चुपचाप कितना कुछ सह रहा था।
माता-पिता ने उसे गले से लगा लिया और सोचने लगे हमनें ये सब क्यों महसूस नहीं किया।
पिता ने पीठ थपथपाते हाई कहा कि बेटा- आज हमे एहसास हुआ कि हम अनचाहे ही तुझ पर मानसिक बोझ डाल रहे थे। अब आगे से तुम और हम दोनों ही इस सामाजिक भेड़चाल का हिस्सा नहीं रहेंगे। तुम खुश रहो बेटा और किसी और के जैसे नहीं स्वयं के रूप में अपनी ख़ुशी से आगे बढ़ो। अपना मनचाहा कैरियर चुनो। हमारे लिए सबसे ज़्यादा तुम्हारी ख़ुशी है।
”पिता के इस इन वाक्यों ने जैसे उसके भीतर की सारी गाँठे खोल दी। सबकी आंँखें नम थी लेकिन खुशी से… आयुष ने फिर से शुरुआत की-
लेकिन इस बार किसी और के लिए नहीं, अपने लिए।
उसने पढ़ाई जारी रखी, लेकिन खुद को खोए बिना।
दोस्तों से निसंकोच जुड़ा, अपने मन की बात कहने लगा
और सबसे जरूरी और अच्छी बात खुद को स्वीकार करना सीख गया। अब उसने वह किया जो वह करना चाहता था।
सबका जीवन खुशहाल हो गया।
सभी अभिभावकों से नम्र अनुरोध है। आज भी बहुत से ऐसे आयुष हमारे आसपास हैं। जो मुस्कुराते हैं, पर अंदर से टूटे हुए । युवाओं में ऐसी स्थिति के पीछे कई कारण हैं।
परिवार और समाज की बढ़ती अपेक्षाएँ, लगातार तुलना और सोशल मीडिया का प्रभाव,असफलता का डर, कम्पनियों में काम का प्रेसर, शहरों का अकेलापन और संवाद की कमी
मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी… अपने बच्चों से जुड़े रहे चाहे संवाद के ही माध्यम से ही बहुत जरूरी है। रोज हो रही अनहोनी से बचने के लिए।
खामोशियों के उस पार भी दिल्लगी है,
जहाँ हर दर्द में छुपी एक बंदगी है।
जो सुन ले दिल की अनकही धड़कनों को,
वहीं से शुरू होती असली जिंदगी है।
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’
कार्यकारी संपादक




