कहानी – वो पहली बरसात – सुनीता तिवारी”सरस’

गर्मियों की तपती दोपहर थी। हवा जैसे कहीं ठहर गई थी, और सूरज अपनी पूरी तपिश के साथ धरती को झुलसा रहा था। मैं खिड़की के पास बैठी आसमान को देख रही थी, नीला, खाली और सूना। मन बस एक ही चीज़ चाहता था… बारिश।
अचानक, दूर कहीं बादलों की हल्की गड़गड़ाहट सुनाई दी। मैंने उत्सुकता से आसमान की ओर देखा। काले बादल धीरे-धीरे उमड़ने लगे थे। मन में एक अनजानी खुशी जाग उठी, जैसे कोई पुराना दोस्त मिलने आ रहा हो।
पहली बूंद जब खिड़की की चौखट पर गिरी, तो उसकी आवाज़ ने दिल में एक मीठी सिहरन भर दी। फिर तो जैसे बूंदों की कतार लग गई, टिप-टिप, टप-टप… और देखते ही देखते तेज़ बारिश हो गई।
मैं खुद को रोक न सकी। दौड़कर बाहर आ गई। ठंडी-ठंडी बूंदें चेहरे को छूतीं तो लगता जैसे सारी थकान धो रही हों। मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में घुलकर मन को मदहोश कर रही थी। पेड़-पौधे भी जैसे झूम-झूम कर इस बरसात का स्वागत कर रहे थे।
बचपन की यादें भी उसी बारिश के साथ लौट आईं, कागज़ की नाव बनाना, पानी में दौड़ लगाना, और भीगते हुए खिलखिलाकर हँसना। माँ की आवाज़ भी कानों में गूँज उठी भीग जाओगी तो बीमार पड़ जाओगी । पर उस दिन, उस पहली बरसात में, कोई डर नहीं था, बस खुशी थी।
बारिश धीरे-धीरे थम गई, लेकिन उसकी ठंडक और सुकून दिल में रह गया। आसमान साफ हो गया था, और एक हल्की-सी धूप फिर से झांकने लगी थी।
वो पहली बरसात सिर्फ मौसम का बदलना नहीं थी, वो मन के सूखे को भी भिगो गई थी। आज भी जब बारिश की पहली बूंद गिरती है, वो दिन, वो एहसास, और वो मासूम खुशी फिर से जीवंत हो उठती है।
सुनीता तिवारी”सरस’




