ईश्वर:अंतरतम की अनुगूँज –डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ अहमदाबाद,गुजरात।

भ + ग + व + आ + न—इन अक्षरों में पंचतत्वों का एक सांकेतिक दर्शन झिलमिलाता है,भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर। यही तत्त्व ब्रह्मांड की रचना करते हैं और यही हमारे अस्तित्व को भी आकार देतें हैं। जो विराट बाहर व्याप्त है, उसकी सूक्ष्म प्रतिध्वनि भीतर भी धड़कती है। ईश्वर कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, बल्कि चेतना की वह मौन उपस्थिति है, जो श्वासों के बीच अनकही रहती है। हम उसे मंदिरों, तीर्थों और प्रतीकों में खो़जतें हैं, जबकि वह हमारे अंतर्मन के उसी शांत कोने में प्रतीक्षारत है, जहाँ इच्छाओं का कोलाहल थमता है और अहंकार का आवरण हटता है।
आत्मचिंतन का क्षण ही वह द्वार है, जहाँ खोजने वाला और खो़जा जाने वाला धीरे-धीरे एक हो जातें हैं। शायद ईश्वर को पाना किसी बाहरी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि भीतर उतरने की शुरुआत है,जहाँ आत्मबोध की एक किरण जीवन के प्रत्येक क्षण को प्रार्थना में बदल देती है।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




