वो आखिरी बार — सुनीता तिवारी”सरस”

कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जिनके बारे में उस समय हमें बिल्कुल पता नहीं होता कि यही आखिरी मुलाकात है। हम सहजता से मिलते हैं, हँसते हैं, बातें करते हैं और फिर अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। बाद में वही क्षण स्मृति बनकर मन में ठहर जाता है।
मुझे भी एक ऐसी ही मुलाकात याद है। वह दिन बिल्कुल सामान्य था। न कोई विशेष तैयारी, न मन में कोई आशंका। सामने बैठे अपने प्रियजन से खूब बातें हुईं। छोटी-छोटी बातों पर हँसी भी आई। जाते समय बस इतना ही लगा कि फिर मिलेंगे।
लेकिन समय को शायद कुछ और मंजूर था।
उसके बाद जब कभी वह जगह दिखाई देती है, वही चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। मन कहता है काश! उस दिन थोड़ी देर और बैठी होती, कुछ और बातें कर ली होतीं, जाते समय एक बार फिर मुड़कर देख लिया होता।
अब समझ आता है कि जीवन हमें विदाई का संकेत देकर नहीं जाता। कुछ लोग हमारी जिंदगी से चुपचाप चले जाते हैं और पीछे छोड़ जाते हैं यादों का एक पूरा संसार।
वह आखिरी बार अब मेरे लिए केवल एक घटना नहीं है, बल्कि जीवन का ऐसा पन्ना है जिसे पढ़ते हुए आँखें नम और मन भावुक हो जाता है।
काश, हमें पहले से पता होता कि मेरे बड़े भाईसाहब से यह मुलाकात आखिरी है, तो शायद हम उस पल को जाने ही न देते।
सुनीता तिवारी”सरस”




