साड़ी: स्त्री की संपूर्णता का मौन प्रतीक — डॉ. निर्मला शर्मा
उदयपुर।साड़ी दिवस के अवसर पर प्रख्यात साहित्यकार एवं विचारक डॉ. निर्मला शर्मा ने स्त्री, समाज और परंपरा के संबंधों पर गहन विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि साड़ी कभी भी स्त्री की आधुनिकता के आड़े नहीं आई, बल्कि हर युग में उसने स्त्री को संपूर्णता के साथ प्रस्तुत किया है। उनका कहना था कि साड़ी ने कभी यह नहीं कहा कि उसे आधुनिक बनाया जाए, बल्कि वह हर दौर में स्त्री की गरिमा, शक्ति और अस्मिता को संजोती रही है।
डॉ. शर्मा ने कहा कि जब जींस जैसे आधुनिक वस्त्रों पर सवाल खड़े होते हैं, तब साड़ी स्वयं एक उत्तर बनकर सामने आती है।
समाज में जब स्त्री की स्वतंत्रता पर बहस होती है, तब साड़ी मौन रहते हुए भी स्त्री के पक्ष में एक सशक्त तर्क प्रस्तुत करती है। साड़ी में चलती स्त्री केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि वह घटित होती है—उसका हर कदम यह संदेश देता है कि “मैं धीमी हूँ, कमज़ोर नहीं।”
उन्होंने समाज की दोहरी मानसिकता पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि जिस समाज को स्त्री की आज़ादी से भय लगता है, वही समाज उसे साड़ी पहनाकर देवी बना देता है और उसकी पूजा भी करने लगता है। किंतु सच्चाई यह है कि साड़ी ने कभी स्त्री को नहीं बाँधा, उसे बाँधने का प्रयास हमेशा समाज ने अपनी संकीर्ण सोच, नियमों और अपेक्षाओं के माध्यम से किया है।
डॉ. निर्मला शर्मा ने कहा कि साड़ी केवल एक वस्त्र है, जबकि बंधन हमारी सोच, नज़र और स्त्री से जुड़ी अपेक्षाओं में बनाए गए हैं। साड़ी दिवस केवल साड़ी पहनने का दिन नहीं, बल्कि यह स्वीकार करने का दिन है कि स्त्री को संपूर्ण होने के लिए किसी आधुनिकता की मुहर की आवश्यकता नहीं है। वह हर युग में पूर्ण थी, बस हर युग में उसे अलग-अलग ढंग से समझाया गया।
उन्होंने कहा कि ठीक उसी प्रकार जैसे साड़ी हर दौर में साड़ी ही रही, बस उसे अलग-अलग तरीकों से बाँधा और पहना गया, वैसे ही स्त्री की पहचान भी समय-समय पर समाज ने अपने दृष्टिकोण के अनुसार परिभाषित करने का प्रयास किया




