दोहरा चरित्र –सुनीता तिवारी

कहानी
अगली सुबह युग कुछ बदला-बदला सा था।
मंदिर गया, पर आज हाथ जोड़ते समय उसके मन में पहली बार सवाल उठा
क्या ईश्वर को वही चेहरा दिखता है, जो दुनियां देखती है
या वह भी भीतर का सच जानता है?
दफ़्तर पहुँचा तो वही सहकर्मी, वही माहौल था।
मीठी मुस्कान होंठों तक आकर रुक गई।
एक पल को पुरानी आदत ने उसे उकसाया
किसी और की फाइल अपने नाम से आगे बढ़ा दे।
पर बेटी का भीगा हुआ चेहरा आँखों में कौंध गया।
उसने फाइल वापस रख दी
और साफ़ शब्दों में बॉस से कहा
“यह काम मेरा नहीं, इसे इन्होंने किया है।”
सहकर्मी चौंक गए, बॉस हैरान हुआ,
और युग का दिल पहली बार हल्का महसूस करने लगा।
दिन आसान नहीं थे।
कुछ लोग उसकी सच्चाई पर शक करने लगे,
कुछ ने पुराने व्यवहार का हिसाब माँगा।
युग समझ गया
चरित्र बदलना तारीफ़ पाना नहीं,
खुद से रोज़ लड़ना है।
शाम को घर लौटा तो बेटी ने उसे ध्यान से देखा।
युग ने उसका सिर सहलाया और कहा
“गलत होना बुरा नहीं,
गलत बने रहना बुरा होता है।”
बेटी मुस्कुराई,
और उस मुस्कान में युग को अपनी पहली सच्ची जीत दिखी।
आईना आज भी वही था,
चेहरा भी वही,
पर अब भीतर का सच
उससे नज़रें नहीं चुरा रहा था।
सुनीता तिवारी /स्वरचित




