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आलेख: साहित्य सेवा भी समाजिक सेवा का प्रतिरूप– श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

 

हर इंसान में सेवा का भाव जरूर पनपना चाहिए।जरूरतमंदों की सेवा करना हमारा कर्तव्य बनता है। साहित्यिक सेवा ये भी एक सामाजिक सेवाओं में से एक है।साहित्य में आप अपने विचारों को लिखकर जन जन तक पहुंचाते हैं। हमारे महान कवि लेखक साहित्यकार की रचनाएं हम पढ़ते हैं इससे समाज में जागरूकता का कार्य होता है। साहित्यिक सेवा एक सामाजिक सेवा का एक प्रतिरूप माना गया है।आप किसी बिना लालच के नित्य प्रति लेखन करते हैं यह सेवा ही है। हम पुराना साहित्य पढते है इसमें हमें बहुत ज्ञान मिलता है। साहित्यिक सेवा किसी सामाजिक सेवा से काम नहीं है वास्तव में यही जो काम निस्वार्थ हो वही सच्ची सेवा है। कवि लेखक समाज में असंतोष अराजकता फैली है और अपने लेख रचना द्वारा उन कुरीतियों को आए दिन को रेखांकित करता रहता है। पुराने सभी दृष्टिकोण को उजागर करता रहता है। वर्तमान परिस्थितियों से अवगत कराता है। मनुष्य केवल अपने लिए नहीं जीता बल्कि समाज के लिए भी जीता है। समाज को बेहतर बनाने में साहित्यिक सेवा और सामाजिक सेवा दोनों का विशेष महत्व है।सभी के मार्ग मंगलमय हो।

परोपकार एक देवीय आध्यात्मिक गुण है
हमें जब भी किसी की सेवा का मौका मिले
प्रभु इच्छा समझ कर हमें कर लेना चाहिए
न जाने किस वेश में ईश्वर हमारे घर आ जाये।
“सत्य को ख्वाहिश होती है कि सब उसे जान ले,
और झूठ को हमेशा डर लगता है कि कोई उसे पहचान न ले।”

श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)

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