सीता नवमी — कविता साव पश्चिम बंगाल

सीता नवमी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है। यह दिन माता सीता के प्राकट्य (जन्म) का पावन पर्व माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मिथिला के राजा जनक एक बार अपने राज्य में भयंकर अकाल और सूखे से चिंतित थे। ऋषियों के परामर्श से उन्होंने यज्ञ कराने और स्वयं भूमि को हल से जोतने का निर्णय लिया, ताकि धरती की उर्वरता जागृत हो और प्रजा को कष्टों से मुक्ति मिले।
जब राजा जनक यज्ञभूमि को हल से जोत रहे थे, तभी हल की नोक (सीत) से धरती फटी और उसमें से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई। उस अद्भुत बालिका को देखकर राजा जनक विस्मित और आनंदित हो उठे। उन्होंने उस कन्या को ईश्वर का प्रसाद मानकर अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। हल की रेखा को ‘सीत’ कहा जाता है, इसलिए उस बालिका का नाम “सीता” रखा गया। चूँकि वे राजा जनक की पुत्री बनीं, उन्हें “जानकी” भी कहा गया, और मिथिला की राजकुमारी होने के कारण वे “मैथिली” के नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।
माता सीता को देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है, जो भगवान विष्णु के अवतार श्रीराम की अर्धांगिनी बनीं। उनका जीवन त्याग, धैर्य, मर्यादा और सत्यनिष्ठा का आदर्श प्रस्तुत करता है। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत गुणवान, विनम्र और तेजस्विनी थीं। उनके स्वयंवर में भगवान राम ने शिवजी का धनुष तोड़कर उनका वरण किया और इस प्रकार सीता-राम का दिव्य मिलन हुआ।
सीता नवमी के दिन भक्तजन माता सीता की पूजा-अर्चना करते हैं, व्रत रखते हैं और उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। यह पर्व नारी की शक्ति, पवित्रता और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है। माता सीता का जीवन हमें सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




