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लघुकथा: गर्मियों की एक शाम –  कथाकार: राजेश कुमार ‘राज’

 

गर्मियों की वह शाम अनिकेत के लिए यादगार बन गई थी। घर में गर्मी और उमस के कारण उसका तन-मन क्लांत हो रहा था। कुछ पल खुली हवा में साॅंस लेने की इच्छावश वह अपनी छत पर टहलने चला गया। छत पर वातावरण अपेक्षाकृत सुहाना था।

अभी उसे ऊपर आए हुए कुछ ही देर हुई थी कि वो देखता है कि पड़ोस वाले गिरजा शंकर अंकल की बेटी अर्पिता भी अपनी छत पर आकर पढ़ाई करने बैठ गई। दोनों एक दूसरे को कनखियों से देख लेते। कुछ देर यह सिलसिला चला। इसके बाद न जाने अर्पिता को क्या हुआ उसने अनिकेत की ओर एक माधुर्यपूर्ण स्मित बिखेर दी। कुछ पल के लिए अनिकेत झिझका फिर उसने भी मुस्कान का जवाब मुस्कान से दे दिया। फिर क्या था दोनों के बीच नज़दीकियाॅं बढ़ने लगीं। दोनों रोज़ छत पर मिलने लगे। उनके बीच इश्क़ परवान चढ़ने लगा। लेकिन यह बात गिरजा शंकर जी तक पहुंच गई। उन्हें इस कालोनी में घर लेने पर बहुत अफसोस हो रहा था। आनन-फानन में गिरजा शंकर जी ने अर्पिता के हाथ पीले कर दिए। अनिकेत अपने प्यार को दूर जाते हुए बस देखता रह गया। अब अनिकेत जब भी अपनी छत पर जाता है तो उसे महसूस होता है मानो अर्पिता अब भी अपनी छत पर बैठी उसी की ओर देख रही है और उसकी सूनी ऑंखें उस से पूछ रही हैं, “तुमने मुझे किसी और की कैसे होने दिया? आगे बढ़ कर उसका हाथ क्यों नहीं थाम लिया?” अनिकेत आज भी स्वयं को कायर मानता है और अपराध बोध से ग्रसित जीवन जी रहा है। उनके प्रथम मिलन की गर्मियों की वह शाम अनिकेत को आज भी बहुत याद आती है और उसकी ऑंखें नम कर जाती है।
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