बेजुबान — कवयित्री/ समाजसेविका साधना शर्मा” सरगम ” ग्रेटर नोएडा की कलम से

बात पिछले मई जून की है,जब भी मुझे किसी काम से बाहर आना जाना होता था तो मुझे अपने फ्लैट से निकलकर सीढ़ियों से गुजरकर आना जाना होता था, तो उस क्षण सीढ़ियों पर बनी खिड़की पर मेरी नजर पड़ जाती , तो सामने के प्लाट में जिसके किनारे किनारे कुछ पुराने टूटे फूटे कमरे भी बने हुए थे, वहां मई जून की चिलचिलाती धूप में गाय और भैंस और उनके बच्चे बेहाल हालत में दिख जाते,, जो कि इस बज्र कड़कड़ाती धूप में हाफ रहे होते थे,, आंखों से आंसू निकल रहे होते थे, मुंह से झाग निकल रहे होते थे,,वो इस कठोर ज्वलनशील सूर्याग्नि की तपिश की मार से बिह्बल होकर कभी बैठती तो कभी खड़ी हो जाती,, और ये असहनीय दर्द वो बेजुबान किसी से बयां भी नहीं कर सकते थे , बस अंतर्मन में ये सोचकर सोचकर दुखी हो जाते थे कि इंसान तो इंसान, ये प्रकृति भी हमें नहीं बख्श रही ।और मेरा मन बड़ा व्यथित होता था यह सब देखकर,, फिर मैं जिस दुकान से सामान ले आती थी, वहां जिक्र किया,, और नम्बर लिया, और मैने खूब सुनाया कि इतनी गर्मी में आप लोग कूलर, एसी, में रह रहे, ठंडा पानी पी रहे,, और जानवरों को इस धूप में मरने के लिए छोड़ दिया है,, हालांकि ये उनके अपने पशु (डेयरी)थे हमें उतना हक नहीं था, लेकिन बात यहां अपने पराए की नहीं,, बात जीव और इंसानियत की है,,फिर मैने बोला कि आप उनके लिए कुछ व्यस्था करिए, तब उन्होंने ये व्यवस्था किया,, एक अच्छा खासा टेंट की व्यस्था की,जिसे देखकर मैं बहुत खुश हुई, ऐसा नहीं है कि पूरा मानव समाज ही बुरा है,, अच्छे लोग भी धरती पर है ,बस हमें पहल करने की जरूरत है, अलख जगाने की जरूरत है, लोगो को लगता है कि किसी के साथ कुछ हो रहा है तो हमें क्या मतलब,, मेरा क्या जा रहा है,, तो भाइयों और बहनों हमें मतलब रखने की जरूरत है, क्योंकि बुरा किसी के साथ भी हो सकता हैं।
कवयित्री/ समाजसेविका
साधना शर्मा” सरगम ”
ग्रेटर नोएडा




