पता नहीं चला कब बड़े हो गए — नीलम सोनी फॉर्म ब्यावर राजस्थान
पता हि नहीं चला कब बड़े हो गए।वक्त हवा के जोके से जिंदगी में चला जा रहा। महसूस ही नहीं हुआ। कब बड़े हो गए। कब छोटी छोटी बातों पे रोने वाली, अब चुप रहना सीख गई। कब अपनी पसंद छोड़कर सबकी पसंद पे जीना सीख गए और कब हम धीरे धीरे अपनी मां जैसे होने लग गए। वहीं सहना, वही चुप रहना,वहीं हर दर्द को मुस्कान में छुपा लेना। अब समझ आता है। मां थकती भी थी। पर कभी जताती नहीं थी। आज हम भी वैसे हो गए। सब ठीक है, कहना सीख गए जबकि अन्दर से सब संभाल रहे होते । शायद हम सच में अपने मां जैसे हो रहे है। कभी मां उठाया करती थी। उठ जा, कितना सोएगी। अब जिम्मेदारियों उठा देती है। उठ जा, वरना काम कौन करेगा नींद अब भी आती हैं। पर सकून नहीं आता। बचपन तो छूट गया। पर थकान नहीं जाती। पहले मां की आवाज अलार्म थी अब फ़र्ज़ का शोर जगा देता है। पहले रूठना आसान था अब हर दिन खुद को मानना पड़ता है। और सच तो ये है, अब कोई उठाने वाला नहीं है। बस खुद को ही संभलना पड़ता है । और ये वही दिन है जो बचपन सच में गायब हो जाता है। कब इतनी जिद्द करनी वाली, इतनी समझदार बन गई । पता नहीं चला कब ख्वाइशों की लिस्ट बनाने वाली, आज हर चीज को मन में दबाने सिख गई पता नहीं चला कभी रसोई मे नहीं जाते।आज दिन से कब रात हो जाती रसोई मे। सच में बचपन एक बार जाने के बाद वापस कभी नहीं आता पर उसकी यादें जिंदगी भर अपने जेहन में रहती है। तो दिल खोल के अपनी जिंदगी जिए। नीलम सोनी फॉर्म ब्यावर राजस्थान




