भीष्म की प्रतिज्ञा — नरसा राम जांगु डीडवाना_कुचामन

पहली साँस टूटे, पर वचन न टूटे। यही भीष्म थे।
गंगा का जल जितना शांत था, उतनी ही प्रचंड थी उनकी प्रतिज्ञा की आग।
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हस्तिनापुर के राजमहल में शहनाइयाँ बज रही थीं। महाराज शांतनु का मन आज उदास था। वे नदी किनारे मछुआरों की बस्ती में केवटराज की बेटी सत्यवती को देख बैठे थे। उसकी आँखों में यमुना-सी गहराई थी, और मुस्कान में बसंत-सा उजाला।
शांतनु ने विवाह का प्रस्ताव रखा। पर केवटराज ने शर्त रख दी — “महाराज, मेरी बेटी का बेटा ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा।”
शांतनु चुप हो गए। उनका बड़ा बेटा देवव्रत था — वीर, विद्वान, प्रजा का लाडला। युवराज बन चुका था। पिता कैसे अपने जीते-जी बेटे का हक छीन ले?
महल में सन्नाटा पसर गया। शांतनु खाना-पीना भूल गए। देवव्रत से पिता की हालत देखी न गई।
जब उसे सच्चाई पता चली, तो वह सीधा केवटराज के पास पहुँचा।
बोला, “काकाश्री, मैं आपके सामने प्रतिज्ञा करता हूँ। मैं राज-पाट छोड़ता हूँ। हस्तिनापुर का राजा सत्यवती का बेटा ही होगा।”
केवटराज हँसा, “पर बेटा, कल को तुम्हारे बच्चों का मन बदल गया तो? वे सिंहासन माँगेंगे।”
सबने देखा — उस पल देवव्रत की आँखें अंगारों-सी दहक उठीं। उसने आकाश की ओर हाथ उठाया और गर्जना की, “आज मैं देवव्रत, गंगा-पुत्र, यह भीषण प्रतिज्ञा करता हूँ — मैं जीवन भर विवाह नहीं करूँगा। मेरे कोई संतान नहीं होगी। ताकि कभी कोई मेरे वंश का दावा ही न करे।”
चारों ओर सन्नाटा छा गया। नदी का बहाव भी जैसे थम गया। देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। तभी से उसका नाम पड़ा — भीष्म। यानी ‘जिसने भीषण प्रतिज्ञा की’।
पिता शांतनु की आँखें भर आईं। उन्होंने बेटे को गले लगा कर वरदान दिया, “पुत्र, जब तक तुम खुद न चाहो, मृत्यु तुम्हें छू भी नहीं सकेगी।”
भीष्म मुस्कुराए। उन्होंने राज-पाट छोड़ दिया, सुख छोड़ दिया, अपना सारा जीवन दे दिया। पर अपना वचन नहीं छोड़ा।
इसीलिए आज भी जब कोई अपना कहा निभाता है, तो लोग कहते हैं — “ये तो भीष्म-प्रतिज्ञा है।”
नरसा राम जांगु
डीडवाना_कुचामन




