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प्रकृति से संस्कृति तक़: परिष्कार की यात्रा – डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

 

​प्रकृति वह मूल आधार है जो हमें जन्म और शरीर देती है; यह सहज़, अनगढ़ और शाश्वत है। बीज का अंकुरित होना या अस्तित्व का संघर्ष प्रकृति का स्वभाव है, जहाँ छल नहीं, केवल सत्य है। इसके विपरीत, संस्कृति वह संस्कार है जिसे हमने स्वयं गढ़ा है। यह मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों को ‘मनुष्यता’ में बदलने की प्रक्रिया है।​प्रकृति और संस्कृति का अंतर हमारे व्यवहार में झलकता है। भूख प्रकृति है, किंतु उपवास और मिल-बाँटकर खाना संस्कृति है। भय स्वाभाविक है, लेकिन वीरता और मर्यादा का पालन सांस्कृतिक परिष्कार है। संस्कृति वह छननी है जिससे छनकर आदिम प्रवृत्तियाँ कला, साहित्य और मूल्यों का रूप लेती हैं।​आज का मार्मिक विरोधाभास यह है कि संस्कृति के अहंकार में हमने अपनी नींव यानी प्रकृति को शत्रु मान लिया है। आधुनिकता की कृत्रिमता में मनुष्य ‘सांस्कृतिक’ तो बना, पर ‘स्वाभाविक’ नहीं रहा। विकास की इस अंधी दौड़ में हमने मुखौटे इतने गहरे पहन लिए हैं कि हमारी मौलिकता खो गई है।​सच्चा विकास प्रकृति का बहिष्कार नहीं, बल्कि उसके साथ समन्वय है। जब हम वृक्ष को केवल लकड़ी न मानकर उसे पूजते हैं, वही प्रकृति और संस्कृति का मिलन बिंदु है। श्रेष्ठ मानवता वही है जहाँ संस्कृति, प्रकृति का विनाश करने के बजाय उसका श्रृंगार करे।

-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

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