संबंध: जीवन मूलाधार.– राजेन्द्र परिहार सैनिक

रंग बिन बेरंग सी है सारी दुनिया और प्रेम भरे रंगों बिना अधूरी है संबंधों की मधुरता,,,प्रेम और स्नेहिल विश्वास बिना पारस्परिक संबंध और त्योहारों की सार्थकता।
संबंधों का रंगोत्सव में कितना महत्व है,यह याद आती है बचपन का एक संस्मरण। बात बचपन की है तो लाजमी है कि मित्रों की वानर टोली और शरारतों भरी होली। तब होली बड़ी धूमधाम से मनाई जाती थी। मस्ती औ शरारतें कुछ ज्यादा ही हुआ करती थी और “बुरा न मानो होली है”यह डायलॉग सब गलतियों पर भी पर्दा डाल देता और कोई बुरा भी नहीं मानता। हमारी शैतान टोली न ठंडाई में भंग मिलाकर पीने का विशेष कार्यक्रम बनाया था होली पर और उसे बखूबी क्रियान्वित भी कर दिया। दो दो तीन तीन गिलास ठण्डाई पी ली बड़े मजे से एक मित्र राजू थोड़ा शेखी खोर था,अपनी शेखी में पांच छह गिलास पी गया,,
बोला कुछ नहीं होता है!!,,दो तीन घंटे हम सबने जमकर होली खेली,, धीरे-धीरे भंग अपना असर दिखाने लगी और भंग के नशे में राजू के खेतों में चले गए। पागलपंती शुरू हो चुकी थी। हम सबको थोड़ा थोड़ा होश था लेकिन राजू कुछ ज्यादा ही बहक रहा था। अचानक..वो उठा और खेत के कुंए में झूल गया। हमारे होश उड़ गए..राजू जाने क्या क्या बड़बड़ा रहा था और अपने आप को झुलाए जा रहा था। अरे ये क्या हो गया भाई,,अगर ये कुंए में गिर गया तो क्या होगा। नशा हम सब पर भी हावी था लेकिन होश हवा हो गये थे। उनकी झौपड़ी से एक रस्सी लेकर आए और बड़ी मुश्किल से कोशिश कर के उसे बांध कर बाहर निकाला!
तब जाकर हम सबने चैन की सांस ली।अब भी हम सब घबराए हुए थे और वो दृश्य हमें मौत की खाई जैसा लग रहा था। राजूतो अब भी पूरी तरह होश में नहीं था। उसे नींबू की शिकंजी बनाकर पिलाई .. लगभग दो घंटे बाद वो थोड़ा नॉर्मल हुआ हम सबने यह तय कर लिया कि घर पर या मौहल्ले में किसी भी हाल में यह बात नहीं बताना है। मन में एक संतोष भी था कि हम सब दोस्तों में पारस्परिक संबंध और दोस्ती भाव
इतना गहरा था कि किसी भी हाल में साथ नहीं छोड़ेंगे हम,,ये हमारा वादा था और दोस्ती या संबंध ही हमारे जीवन का सबसे सुंदर रंग है। आज भी उस समय के अज़ीबोग़रीब हादसे को भूला नहीं हूं मैं,, और जब भी होली आती है वो भयानक दृश्य साकार हो उठता है।
राजेन्द्र परिहार सैनिक



