संस्मरण: वो यादगार ख़त लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

बात वर्ष 1984 की है। अपने विभाग (एक केन्द्रीय पुलिस संगठन) के दिल्ली स्थित मुख्यालय में 25 जनवरी 1984 के दिन सरकारी सेवा में संलग्न होने के दो-चार दिन पश्चात मैं और मेरे साथ भर्ती हुए सभी लड़कों को मध्यप्रदेश के शिवपुरी शहर में स्थित विभागीय प्रशिक्षण केन्द्र में बेसिक ट्रेनिंग के लिए भेज दिया गया।
वहाॅं उपस्थित होने पर पहले दिन हमें हास्टल में कमरे दिए गए। तत्पश्चात वर्दी और आवश्यक साजो-सामान की किट्स उपलब्ध कराई गईं। प्रशिक्षण केन्द्र का वातावरण बड़ा बोझिल सा था। डर का माहौल था। उस्ताद लोग सीधे मुॅंह बात नहीं कर रहे थे और बात-बात घुड़कियाॅं दे रहे थे। बाद में वही उस्ताद दोस्ताना हो गए थे। दूसरे दिन हम लोगों को सरकारी बारबर (नापित) मांगी लाल के सुपुर्द कर दिया गया। मांगी लाल बड़ी-बड़ी रौबीली मूझों का स्वामी एक 40-45 वर्ष का काला सा आदमी था। हालांकि उसका व्यक्तित्व जल्लाद जैसा भयावह था लेकिन वह अत्यंत मृदुभाषी और व्यवहार कुशल व्यक्ति था। अब वह हमारे यत्नपूर्वक बढ़ाए गए और पोषित बालों को एक-एक कर के फौजी शैली में काटने लगा। हर लड़का उस से आग्रह कर रहा था कि बाल ज्यादा छोटे न काटे। वह मुस्कुरा कर उत्तर देता, “सर आप चिंता ना करो।” उसने किया वही जिसे करने के लिए वह निर्देशित था। खैर हम सब लोगों के कटोरा-कट शैली में बाल काट कर उसने हमें पक्का रंगरूट बना दिया।
इसके बाद पीटी-परेड-श्रमदान और आंतरिक कक्षाओं (इंडोर क्लासेज़) का थका डालने वाला सिलसिला शुरू हो गया। तड़के 4 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक कोई न कोई गतिविधि चलती ही रहती थी। ‘रात्रि नफरी गिनती’ (नाइट रोल-काल) के बाद बिस्तर नसीब हुआ करता था। आंतरिक पाठ्यक्रम में उर्दू भाषा को भी शामिल किया गया था। अन्य विषयों के साथ-साथ उर्दू लिखना और पढ़ना भी सिखाया जाता था। मैं उर्दू सीखने में काफी आगे था। मेरे उर्दू टीचर मुझसे बहुत प्रभावित थे। जल्दी ही मैंने उर्दू लिखना सीख लिया। घर में उर्दू तो क्या कोई हिन्दी भी पढ़ना-लिखना नहीं जानता था। मैं अपना उर्दू ज्ञान प्रदर्शित करने के लिए उतावला हो रहा था परन्तु असमंजस में था कि किसके सामने अपने इस हुनर की नुमाइश करूॅं। फिर मुझे मेरे बड़े भाई (ताऊ जी के बेटे) स्व० श्री सत्यस्नेहदर्शी जी का नाम याद आ गया। मेरे भाई पेशे से पत्रकार, कवि और लेखक थे। सरकारी सेवा में आने से पूर्व उनकी ही अनुशंसा पर मुझे हिन्दी दैनिक ‘बद्री विशाल’ में समाचार सम्पादक के पद पर कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ था। मैंने झटपट अपनी कुशलक्षेम का एक ख़त उर्दू में लिख कर उन्हें पोस्ट कर दिया। ख़त पाकर वो बहुत प्रसन्न हुए। अपने हाथों से उर्दू भाषा में लिखा मेरा वो पहला और अंतिम पत्र एक यादगार बन कर रह गया।
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