गिनती में गड़बड़, तो विकास में अड़चन—जनगणना 2027 पर एक नजर

आने वाली जनगणना 2027 फिर एक बार हमारे दरवाज़े पर दस्तक देने वाली है। फर्क बस इतना है कि इस बार भी हम वही करेंगे—दरवाज़ा खोलेंगे, दो-चार सवालों के जवाब आधे मन से देंगे और फिर उम्मीद करेंगे कि विकास “फुल स्पीड” से दौड़ पड़े।
जनगणना कोई टाइमपास सर्वे नहीं है। इसी के आंकड़ों पर तय होता है कि कहाँ स्कूल खुलेगा, कहाँ अस्पताल बनेगा और किस इलाके में सड़क की किस्मत चमकेगी। लेकिन हममें से कई लोग इसे ऐसे लेते हैं जैसे कोई औपचारिकता हो—“जो याद आया बता दिया, जो नहीं आया छोड़ दिया।” और फिर बाद में शिकायत भी पूरी ईमानदारी से करते हैं—“हमारे यहाँ तो कुछ हुआ ही नहीं।”
अब बात मकान की—यहाँ तो रचनात्मकता अपने चरम पर होती है। पक्का घर हो तो कभी “कच्चा” बता देते हैं, ताकि शायद कोई योजना मिल जाए। और किराए पर रह रहे हों तो “अपना” बताने में भी कोई झिझक नहीं होती। जबकि सच्चाई यह है कि मकान पक्का है या कच्चा, खुद का है या किराये का—यह सही बताना उतना ही जरूरी है जितना परिवार के सदस्यों की सही संख्या बताना।
सरकार इन्हीं जानकारियों के आधार पर योजनाएँ बनाती है। गलत जानकारी देकर हम किसी और का नहीं, बल्कि अपने ही हिस्से की सुविधा को पीछे धकेलते हैं।
और एक बात जो हम अक्सर भूल जाते हैं—जनगणना करने आने वाला व्यक्ति कोई “सरकारी बोझ” नहीं होता। वह कोई महिला कर्मी भी हो सकती है, कोई उम्रदराज़ अध्यापक भी, जो धूप-धूल में सिर्फ अपना कर्तव्य निभाने आया है। उससे रूखा व्यवहार करना या टालमटोल करना न केवल असम्मान है, बल्कि हमारी ही सोच का आईना है।
सच तो यह है कि अगर गिनती ही गलत होगी, तो तरक्की का हिसाब भी गड़बड़ ही निकलेगा। आप पाँच में से तीन सदस्य ही गिनवाएँगे, या मकान की स्थिति बदलकर बताएँगे, तो योजनाएँ भी उसी हिसाब से आएँगी—बाकी फिर “जुगाड़” के भरोसे।
जनगणना में सहयोग करना कोई एहसान नहीं, बल्कि अपनी ही सुविधा का निवेश है। गणनाकर्मी जब जानकारी लेने आए, तो उसे ऐसे न देखें जैसे कोई उधार वसूलने आया हो। सही और पूरी जानकारी दें—चाहे वह परिवार की हो या मकान की।
अंत में बात सीधी है—अगर हम खुद को सही नहीं गिनवाएँगे, तो विकास भी हमें आधा-अधूरा ही मिलेगा। फिर हम यही कहते रह जाएंगे—
“देश तो आगे बढ़ गया, बस हमारी गली ही नक्शे से गायब रह गई।”
और सच्चाई कड़वी है—जनगणना के समय हम आंकड़ों से खेलते हैं, और बाद में वही आंकड़े हमारे साथ खेल जाते हैं।
— अजय शर्मा, बीदासर (RES)




