विषय: क्या बच्चों पर अपनी महत्वकांक्षाएं थोपना सही है? प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

बच्चे किसी भी परिवार की सबसे अनमोल धरोहर होते हैं। प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए अनेक सपने संजोते हैं और उन्हें सफल देखना चाहते हैं। किंतु प्रश्न यह उठता है कि क्या अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं को बच्चों पर थोप देना उचित है? इसका उत्तर नकारात्मक है, क्योंकि हर बच्चे की अपनी अलग रुचियाँ, क्षमताएँ और जीवन के प्रति दृष्टिकोण होते हैं।
अक्सर माता-पिता अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए बच्चों को उसी दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। कोई चाहता है कि उसका पुत्र डॉक्टर बने, तो कोई अपनी बेटी को इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहता है। यदि बच्चे की रुचि उस क्षेत्र में न हो, तो उस पर अनावश्यक दबाव पड़ता है। यह दबाव उसके मानसिक स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और रचनात्मकता को प्रभावित कर सकता है।
बच्चों को केवल अंक प्राप्त करने या प्रतिष्ठित व्यवसाय चुनने की मशीन नहीं समझना चाहिए। वे भी अपनी इच्छाएँ, भावनाएँ और सपने रखते हैं। जब उन्हें अपनी पसंद के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तब वे अधिक उत्साह, समर्पण और आत्मविश्वास के साथ कार्य करते हैं और सफलता भी प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत, थोपे गए निर्णय उनके भीतर कुंठा, तनाव और असंतोष को जन्म दे सकते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि माता-पिता बच्चों को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ दें। उनका कर्तव्य है कि वे उचित मार्गदर्शन दें, अच्छे संस्कार प्रदान करें और सही-गलत का विवेक विकसित करें। किंतु मार्गदर्शन और दबाव में अंतर होता है। बच्चों की प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारना ही सच्चे अभिभावक का धर्म है।
अतः यह कहना उचित होगा कि बच्चों पर अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाएँ थोपना न्यायसंगत नहीं है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के सपनों का सम्मान करें, उन्हें सहयोग दें और उनकी मौलिक पहचान को विकसित होने का अवसर प्रदान करें। जब बच्चे अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप आगे बढ़ते हैं, तभी वे सच्चे अर्थों में संतुष्ट, सफल और समाज के लिए उपयोगी नागरिक बन पाते हैं।
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




