आख़िरी रोटी- कविता साव पश्चिम बंगाल

आख़िरी रोटी- कविता साव
पश्चिम बंगाल
रामदीन के घर में उस दिन चूल्हा नहीं जला था।
सुबह से ही उसकी पत्नी जमुना मिट्टी के चूल्हे के पास बैठी राख कुरेदती रही। शायद राख के नीचे कोई भूला हुआ अंगारा मिल जाए और उसके सहारे बच्चों के लिए कुछ बना सके। मगर राख ठंडी थी।
घर में चार प्राणी थे—रामदीन, जमुना और उनके दो बच्चे। रामदीन गाँव के जमींदार के खेत में मजदूरी करता था। इस साल बारिश देर से आई थी। खेतों में फसल कम हुई और मजदूरी के दिन उससे भी कम।
जमुना ने धीरे से पूछा, “आज काम नहीं मिला?”
रामदीन ने सिर झुका लिया।
“मिला था।”
“फिर?”
“मजदूरी अनाज में देने को कह रहा था। मैंने कहा, घर में चूल्हा तीन दिन से नहीं जला। अनाज दे दो। बोला—पहले पुराना हिसाब चुकाओ।”
जमुना चुप हो गई।
पुराना हिसाब!
गाँव के गरीब आदमी के जीवन में इससे बड़ा मजाक और क्या था? जितना कमाते, उतना ही उधार बढ़ता जाता। जैसे गरीबी कोई कुआँ हो, जिसमें आदमी जितना पानी निकालता, कुआँ उतना ही गहरा होता जाता।
छोटा बेटा सोनू माँ की साड़ी खींचकर बोला, “अम्मा, आज रोटी मिलेगी?”
जमुना ने उसकी ओर देखा और मुस्कराने की कोशिश की।
“हाँ बेटा, मिलेगी।”
बच्चा निश्चिंत होकर बाहर खेलने चला गया।
रामदीन ने पत्नी की ओर देखा। वह मुस्कान उसे चुभ गई।
“झूठ क्यों बोला?”
“बच्चे को भूख का सच समझ में आए, उससे पहले दुनिया का सच समझ जाएगा।”
शाम को रामदीन गाँव की दुकान पर पहुँचा। दुकानदार लाला कैलाशदास हिसाब की मोटी बही खोले बैठा था।
रामदीन ने हाथ जोड़कर कहा, “लाला, दो सेर आटा दे दो। मजदूरी मिलते ही चुका दूँगा।”
लाला ने चश्मा नाक पर चढ़ाया।
“तुम्हारा हिसाब देखा है?”
“देखा है।”
“पिछले महीने का भी बाकी है।”
“मालूम है।”
“फिर?”
रामदीन कुछ नहीं बोला।
लाला ने बही बंद कर दी।
“उधार बंद।”
रामदीन लौटने लगा।
तभी उसकी नजर दुकान के बाहर बैठे एक बूढ़े भिखारी पर पड़ी। उसके सामने मिट्टी की कटोरी में आधी रोटी रखी थी।
रामदीन ने कुछ क्षण उस रोटी को देखा।
भिखारी ने रोटी उठाई, फिर रामदीन की ओर देखकर बोला, “ले लो।”
रामदीन चौंक गया।
“नहीं बाबा।”
“तुम्हें जरूरत है।”
“तुम्हें भी तो है।”
बूढ़ा हँस पड़ा।
“जिसके पास आधी रोटी है, वह गरीब है। जिसके पास किसी भूखे को देने का मन है, वह गरीब नहीं।”
रामदीन की आँखें भर आईं।
उसने रोटी नहीं ली।
घर लौटते समय रास्ते में उसे एक बोरा पड़ा दिखाई दिया। बोरा फटा हुआ था और उसमें गेहूँ के कुछ दाने बिखरे पड़े थे।
रामदीन बैठ गया।
एक-एक दाना उठाने लगा।
उसे लगा जैसे वह गेहूँ नहीं, अपने बच्चों की साँसें बटोर रहा हो।
तभी पीछे से आवाज आई—
“क्या कर रहे हो?”
रामदीन ने पलटकर देखा। गाँव का स्कूल मास्टर हरिशंकर खड़ा था।
रामदीन ने कहा, “दाने हैं मास्टर जी। फेंक दूँ तो पाप लगेगा।”
मास्टर कुछ देर उसे देखता रहा।
फिर बोला, “दाने बटोरने वाला आदमी कभी छोटा नहीं होता रामदीन। छोटा वह है जो अनाज के गोदाम भरकर भी भूखे आदमी को रोटी न दे।”
अगले दिन मास्टर सीधे जमींदार के घर पहुँचा।
उसने गाँव के मजदूरों की मजदूरी का हिसाब माँगा। धीरे-धीरे दूसरे मजदूर भी उसके साथ हो गए।
पहली बार जमींदार के सामने गरीब आदमी अकेला नहीं था।
जमींदार ने गुस्से से पूछा, “तुम लोग मेरे खिलाफ हो गए?”
मास्टर ने शांत स्वर में कहा, “नहीं मालिक, हम आपके खिलाफ नहीं हैं। हम भूख के खिलाफ हैं।”
कुछ देर सन्नाटा रहा।
उस दिन मजदूरों को उनकी बकाया मजदूरी का एक हिस्सा अनाज में मिला।
रामदीन घर लौटा तो जमुना ने चूल्हे पर तवा चढ़ा रखा था।
सोनू दौड़कर आया।
“अम्मा! आज सच में रोटी बनेगी?”
जमुना हँसी।
“हाँ बेटा, आज सच में।”
उसने पहली रोटी तवे से उतारी।
रामदीन ने देखा—जमुना ने वह रोटी दो टुकड़ों में बाँटी और बच्चों की थाली में रख दी।
उसने पूछा, “तुम नहीं खाओगी?”
जमुना बोली, “मुझे भूख नहीं है।”
रामदीन मुस्कराया।
“आज झूठ मत बोलो।”
जमुना ने उसकी ओर देखा।
दोनों हँस पड़े।
उस रात उनके घर में रोटियाँ कम थीं, मगर पहली बार ऐसा लगा कि भूख से बड़ी उनकी उम्मीद है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




