Welcome to Nazar India 24   Click to listen highlighted text! Welcome to Nazar India 24
Uncategorized

“उम्र की सांझमें गरिमा का संबल” – उर्मिला मोर बरहामपुर (ओडिसा)

जीवन के अंतिम पड़ाव में जब शरीर थकने लगता है और अपनों की सहारे की सबसे ज्यादा दरकार होती है तब यदि अपनी ही संतानों के दुर्व्यवहार के कारण बुजुर्गों को अपमान और उपेक्षा का दंश झेलना पड़े तो यह समाज के गहन नैतिक पतन का प्रमाण है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि वरिष्ठ नागरिक अपने भरण पोषण सुरक्षा और आत्म सम्मान की रक्षा के लिए कुसंतानों ,बेटे बहु को अपने संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। यहफैसला केवल कानूनी व्याख्या नहीं है बल्कि देश के करोड़ों असहाय बुजुरगो को यह समवैधानिक भरोसा दिलाती है की ढलती उम्र कभी भी उपेक्षा लाचारी या अपमान का पर्याय नहीं बन सकती।
यह मामला लखनऊ के एक बुजुर्ग नागरिक से जुड़ा था जिनकी खुद की खरीदी हुयी संपत्ति में उनके बेटे और बहू द्वारा इतना कलह और दुर्व्यवहार किया गया कि उन बुजुर्ग को 81 वर्ष से अपने ही घर छोड़कर वृद्ध आश्रम की शरण बनी पड़ी जब एसडीएम और जिला मजिस्ट्रेट को ट्रिब्यूनल ने बेटे बहु को बेदखल करने का आदेश दिया तो इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस आधार पर आदेश रद्द कर दिया था ।इस आधार पर कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 में बेदखली का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट के संकीर्ण दृष्टिकोण को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कानून किसी ट्रिब्यूनल को बुजुर्गों की सुरक्षा और भरण पोषण का अधिकार देता है तो उस उद्देश्य को पूरा करने के लिए जरूरी हर कदम जिसमें प्रताड़ित करने वाले बच्चों का घर से निकालना भी शामिल है उठाने को शक्ति ट्रिब्यूनल के पास स्वत निहित है।
अदालत नेअत्यंत मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी सभ्य समाज का स्तर इस बात से तय होता है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा सम्मान और सुरक्षा देता है
भारत की सनातन संस्कृति में मातृ देवो भव पितृ देवो भव और श्रवण कुमार के आदर्श हमारे सामाजिक ताने-बाने की नीव रहे हैं लेकिन भारतीय संस्कारों को खत्म करने व मैकाले की गढी अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था और पश्चिम के घोर व्यक्तिवादी भौतिकवाद के अंधानुकरण ने हमारे घरों की परिभाषा ही बदल दी ।विकास और केरियर की अंधी दौड में पैसा और पैकेज ही जीवन का एकमात्र पैमाना बन गया है जहां मानवीय संवेदनाएं, त्याग, कृतज्ञताऔर पारिवारिक संस्कार पीछे छूटने लगे हैं।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा युवा देश होने का गौरव मना रहा है लेकिन एक अनदेखी सच्चायी भी है कि हमारा देश बड़ी तेजी से एजिंग सोसाइटी यानी बुजुर्गों के समाज की ओर बढ़ रहा है ।देश में 60 वर्षों से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों की संख्या वर्तमान में 15 करोड़ के पार पहुंच चुकी है अनुमान है कि 2050 तक देश की कुल आबादी का 20% से अधिक हिस्सा बुजुर्गों का होगा। देश के 90% से अधिक बुजुर्गों के पास कोई नियमित पेंशन या व्यापक स्वास्थ्य बीमा कवर नहीं है इस महंगाई में नाम मात्र की पेंशन ऊंट के मुंह में जीरा साबित होती है।
हम 2047 तक विकसित भारत बनाने का महा संकल्प लेकर चल रहे हैं लेकिन क्या केवल गगनचुंबी इमारतें, बुलेट ट्रेन और बढ़ती जीडीपी ही विकसित होने का पैमाना है यदि हमारे समाज के संरक्षक उम्र के अंतिम पड़ाव में भोजन ,दवा और छत के लिए अदालतों के चक्कर काटने पर मजबूर हो तो यह कैसा विकास होगा ।इसलिए ट्रिब्यूनल सुनिश्चित करें कि बेदखलके मामले में प्रक्रियागत देरी न हो सरकार की ओर से बुजुर्गों के लिए कैसलेश जेरियाटिॅक केयर और गरिमा पूर्ण पेंशन का मजबूत सुरक्षा ढांचा बनाया जाए। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पाठ्यक्रम में बुजुर्गों के प्रति आदर ,पारिवारिक उत्तरदायित्व और नैतिक बोध को अनिवार्य रूप से शामिल कराया जाए।
जीवन की ढलती सांझ में बुजुर्गों को दया या खैरात नहीं बल्कि अपना हक और गरिमा चाहिए इसके बीज बचपन से ही संस्कारों के रूप में रोपने होंगे।।
उर्मिला मोर
बरहामपुर (ओडिसा)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!