ख़त का इंतज़ार – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या” संस्मरण

वह भी एक समय था, जब घर के दरवाज़े पर डाकिए की आहट किसी त्योहार से कम नहीं लगती थी। सुबह से ही मन अनायास रास्ते की ओर लगा रहता—कब डाकिया आएगा और कब उसके हाथों में अपनों की लिखावट वाला कोई लिफाफा दिखाई देगा।
उन दिनों मोबाइल नहीं थे, न पल-पल की खबर देने वाली कोई सुविधा। दूर रहने वाले अपने सचमुच दूर होते थे। उनकी कुशल-क्षेम जानने का सबसे भरोसेमंद सहारा था—एक ख़त।
डाकिया गली में आता तो बच्चों से लेकर बुज़ुर्गों तक की निगाहें उसकी थैली पर टिक जातीं। मेरा मन भी धड़क उठता। कभी वह पड़ोसी के नाम पुकार लगाता और मैं निराश होकर लौट आती। लेकिन जिस दिन वह मेरे नाम का लिफाफा थमाता, उस छोटे-से कागज़ की कीमत संसार की किसी बड़ी सौगात से कम नहीं लगती थी।
लिफाफा हाथ में आते ही मैं उसे तुरंत नहीं खोलती। पहले उसे उलट-पलटकर देखती, लिखावट पहचानती और फिर बड़े स्नेह से खोलती। कागज़ पर लिखे शब्दों में मुझे अपनों की आवाज़ सुनाई देती। कहीं माँ की चिंता होती, कहीं भाई का अपनापन, कहीं दूर बैठे किसी अपने की छोटी-सी शिकायत।
ख़त पढ़ते-पढ़ते कभी आँखें नम हो जातीं, तो कभी चेहरे पर मुस्कान खिल उठती। उन चंद पन्नों में दूरी सिमट जाती और लगता जैसे अपने सामने बैठे बातें कर रहे हों।
आज संदेश पल भर में पहुँच जाते हैं। उँगली के एक स्पर्श से हालचाल मिल जाता है, पर वह इंतज़ार कहाँ रहा? वह बेचैनी, वह उत्सुकता और डाकिए के आने पर धड़कता हुआ दिल—सब जैसे समय के किसी पुराने संदूक में बंद हो गए हैं।
आज भी कभी कोई पुराना ख़त हाथ लग जाए तो मैं उसे बड़े जतन से पढ़ती हूँ। कागज़ भले पीला पड़ गया हो, स्याही कुछ धुँधली हो गई हो, मगर उसमें बसे रिश्तों की गर्माहट आज भी वैसी ही है।
शायद इसलिए अपनों के ख़त केवल शब्द नहीं होते थे—वे दूरियों पर रखे हुए अपनत्व के हाथ होते थे।
और उन हाथों के आने का इंतज़ार… आज भी मन के किसी कोने में बाकी है।
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




