Welcome to Nazar India 24   Click to listen highlighted text! Welcome to Nazar India 24
Uncategorized

अस्तित्व से विस्तार तक की यात्रा — डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ लेखिका एवं कवयित्री

 

किसी नदी को देखकर कभी-कभी लगता है—आखिर उसके भीतर ऐसा क्या है जो उसे लगातार बहने के लिए विवश करता है? न कोई मंज़िल उसे दिखाई देती है, न रास्तों की निश्चितता; फिर भी वह चलती रहती है। पहाड़ों से निकलती एक पतली-सी जलधारा धीरे-धीरे अपना आकार पाती है और एक दिन इतनी विराट हो जाती है कि उसके किनारे जीवन की पूरी दुनिया बस जाती है।
शायद यही अस्तित्व से विस्तार तक की यात्रा है।
नदी का अस्तित्व उसके उद्गम में है, लेकिन उसका विस्तार उसकी यात्रा में। वह जहाँ से निकलती है, वहीं ठहर जाए तो उसका होना केवल एक छोटी-सी धारा तक सीमित रह जाएगा। बहते हुए ही वह अपने होने का अर्थ खोजती है। रास्ते में पत्थर मिलते हैं तो उन्हें चीरती है, ऊँचाई मिलती है तो ढलान खोज लेती है और जब कोई मार्ग नहीं मिलता, तो अपना मार्ग स्वयं बनाती है।
मनुष्य का जीवन भी इससे अलग नहीं।
हम सभी किसी न किसी छोटे से अस्तित्व के साथ जीवन आरंभ करते हैं। हमारी पहचान जन्म, परिवार, परिवेश और परिस्थितियों से बनती है, लेकिन हमारी वास्तविक पहचान इन सीमाओं से बाहर निकलकर निर्मित होती है। जीवन हमें बार-बार ऐसे मोड़ देता है जहाँ हमें तय करना होता है कि रुकना है या आगे बढ़ना है।
कई बार परिस्थितियाँ हमें बाँधती हैं। कभी रिश्ते, कभी असफलताएँ, कभी आर्थिक कठिनाइयाँ, कभी सामाजिक अपेक्षाएँ और कभी स्वयं हमारे भीतर का भय। ऐसे समय में नदी हमें चुपचाप एक बात सिखाती है—रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन गति समाप्त होना आवश्यक नहीं।
नदी चट्टान से टकराकर शिकायत नहीं करती। वह अपना स्वभाव नहीं बदलती; बस अपनी दिशा बदल लेती है। यही जीवन की एक बड़ी सीख है। हर परिस्थिति हमारे अनुकूल हो, यह आवश्यक नहीं, लेकिन हर परिस्थिति में स्वयं को बचाए रखते हुए आगे बढ़ना संभव है।
नदी का सौंदर्य उसकी गति में जितना है, उतना ही उसकी संवेदना में भी है। वह अपने लिए नहीं बहती। खेतों को हरियाली देती है, प्यास बुझाती है, पेड़ों को जीवन देती है और अनगिनत जीवों का आश्रय बनती है। उसके अस्तित्व का विस्तार तब होता है जब वह दूसरों के जीवन का हिस्सा बनती है।
मनुष्य भी केवल अपने लिए जीकर अपने अस्तित्व को कितना विस्तार दे सकता है?
हमारा होना तब सार्थक होता है जब हमारी संवेदना किसी दूसरे के दुःख तक पहुँचती है, हमारी सफलता किसी और के लिए प्रेरणा बनती है, हमारी उपस्थिति किसी के अकेलेपन में सहारा बनती है और हमारे कर्म आने वाली पीढ़ियों के लिए कुछ बेहतर छोड़ जाते हैं।
अस्तित्व केवल यह प्रश्न नहीं है कि “मैं कौन हूँ?”
वह इससे आगे जाकर पूछता है—“मेरे होने से दुनिया में क्या बदला?”
आज का मनुष्य सुविधाओं और उपलब्धियों की दौड़ में बहुत आगे निकल आया है, लेकिन भीतर कहीं वह अपने ही अस्तित्व से दूर होता जा रहा है। उसके पास समय कम है, संवाद कम है और ठहरकर स्वयं को सुनने की क्षमता भी कम होती जा रही है। ऐसे समय में नदी का बहना हमें भीतर लौटने का निमंत्रण देता है।
नदी हमें बताती है कि विस्तार का अर्थ केवल बड़ा होना नहीं है। विस्तार का अर्थ है—गहरा होना।
जैसे-जैसे नदी आगे बढ़ती है, उसमें अनेक छोटी धाराएँ मिलती जाती हैं। वह अपने भीतर बहुत कुछ समेटती है, फिर भी अपनी मूल पहचान बनाए रखती है। मनुष्य भी जीवन में मिलने वाले रिश्तों, अनुभवों, संघर्षों और स्मृतियों से समृद्ध होता है। कुछ लोग हमें खुशी देते हैं, कुछ हमें तोड़ते हैं, कुछ हमें बदलते हैं और कुछ हमें यह सिखाकर चले जाते हैं कि हम वास्तव में कौन हैं।
इन सबको समेटकर आगे बढ़ना ही जीवन है।
नदी अपने अतीत को छोड़ती नहीं, उसे अपने प्रवाह में साथ लेकर चलती है। शायद मनुष्य को भी अपनी स्मृतियों से लड़ने के बजाय उन्हें स्वीकार करना सीखना चाहिए। बीता हुआ समय वापस नहीं आता, लेकिन उसकी सीख हमारे वर्तमान को दिशा दे सकती है।
और अंततः नदी समुद्र तक पहुँचती है।
क्या वहाँ जाकर उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है?
नहीं।
वह अपनी सीमित पहचान से निकलकर विराट का हिस्सा बन जाती है। उसका विस्तार उसकी व्यक्तिगत सीमा से बहुत आगे चला जाता है। यही मनुष्य के जीवन का भी अंतिम सत्य है—हमारे जीवन की सार्थकता केवल इस बात में नहीं कि हमने कितना पाया, बल्कि इस बात में भी है कि हमने अपने पीछे क्या छोड़ा।
कुछ शब्द, कुछ संस्कार, कुछ रिश्ते, कुछ संवेदनाएँ और कुछ ऐसे कर्म, जिन्हें समय भी मिटा न सके।
इसलिए अस्तित्व से विस्तार की यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की यात्रा है। यह स्वयं को पहचानने, स्वीकार करने, सँवारने और दूसरों तक पहुँचाने की यात्रा है। इसमें संघर्ष भी है, विराम भी; बिछोह भी है, मिलन भी; आँसू भी हैं और उम्मीद भी।
बस एक बात नदी कभी नहीं भूलती—
बहना।
क्योंकि ठहरा हुआ जल धीरे-धीरे अपना जीवन खो देता है, जबकि बहता हुआ जल हर क्षण नया होता है।
शायद जीवन भी हमसे यही कहता है—
अपने रास्ते की चट्टानों से मत घबराओ,
हर मोड़ को अंत मत समझो,
हर बिछोह को अपना आखिरी सच मत मानो।
बहते रहो।
क्योंकि—
अस्तित्व वह है जहाँ से यात्रा शुरू होती है,
विस्तार वह है जहाँ जीवन अपने होने का अर्थ पाता है,
और बहते रहना ही वह साहस है
जो एक छोटी-सी धारा को
एक दिन नदी बना देता है…।

डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!
Click to listen highlighted text!