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शिक्षक होना—एक विरासत, एक जिम्मेदारी- – सुनिता त्रिपाठी ‘अजय’

 

कुछ रिश्ते हमें जीवन में चुनने नहीं पड़ते, वे हमें विरासत में मिलते हैं। मेरे लिए शिक्षा और साहित्य से रिश्ता भी ऐसा ही है।
मेरे दादाजी स्कूल चलाया करते थे। बचपन में उन्हें शिक्षा के लिए समर्पित देखते हुए शायद अनजाने में ही मेरे मन में शिक्षक होने का बीज पड़ गया था। मेरे ताऊजी संगीत की संस्था चलाते थे। घर में साहित्य की चर्चा होती थी, संगीत के स्वर गूँजते थे और ज्ञान को जीवन का हिस्सा माना जाता था। उस वातावरण ने मेरे व्यक्तित्व को बहुत गहराई से प्रभावित किया।
विवाह के बाद जीवन की दिशा बदली, जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, लेकिन भीतर कहीं सीखने-सिखाने की इच्छा बनी रही। मैंने एक विद्यालय में अध्यापन शुरू किया। बच्चों के बीच बिताया वह समय मेरे जीवन के सबसे सुंदर अनुभवों में शामिल है।
मैंने जाना कि कक्षा में केवल किताबें नहीं पढ़ाई जातीं, वहाँ जीवन भी पढ़ाया जाता है। कोई बच्चा अपनी प्रतिभा लेकर आता है, कोई अपनी झिझक; कोई आगे बढ़ने का सपना देखता है तो कोई अपने भीतर का डर छिपाकर बैठा रहता है। शिक्षक का काम केवल पाठ पूरा करना नहीं, बल्कि उस बच्चे के भीतर छिपे विश्वास को जगाना भी है।
विद्यालय के साथ-साथ मैंने कॉलेज में भी पार्टटाइम कार्य किया। वहाँ विद्यार्थियों के साथ संवाद ने मुझे यह सिखाया कि उम्र चाहे कोई भी हो, सीखने की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
लेकिन जीवन हमेशा एक ही राह पर नहीं चलता। उस समय प्रतियोगी परीक्षाओं का आकर्षण और अपने भविष्य को एक नई दिशा देने की इच्छा मेरे मन में थी। इसलिए मैंने विद्यालय का अध्यापन छोड़कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में स्वयं को लगा दिया। वह दौर मेरे लिए मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास की परीक्षा था। परिणाम चाहे जैसा रहा हो, उस तैयारी ने मुझे यह जरूर सिखाया कि लक्ष्य पाने के लिए स्वयं को लगातार बेहतर बनाते रहना पड़ता है।
समय के साथ मेरी जीवन-यात्रा ने फिर एक अलग मोड़ लिया। आज मैं गृहिणी हूँ। अब नियमित रूप से विद्यालय की कक्षा में नहीं जाती, लेकिन क्या शिक्षक कभी सचमुच सेवानिवृत्त होता है? मेरे लिए इसका उत्तर नहीं है।
आज मेरी कक्षा बदल गई है। मेरे हाथ में उपस्थिति रजिस्टर की जगह कलम है और मेरे सामने विद्यार्थियों की जगह कागज के पन्ने हैं। साहित्य मेरे लिए अभिव्यक्ति भी है और समाज से संवाद का माध्यम भी। मैं अपने शब्दों के माध्यम से वही बात कहने का प्रयास करती हूँ, जो कभी बच्चों के बीच खड़े होकर कहा करती थी—सीखते रहिए, संवेदनशील रहिए और मनुष्यता को सबसे ऊपर रखिए।
आज तकनीक ने ज्ञान को हमारी उँगलियों तक पहुँचा दिया है। बच्चे कुछ भी जानने के लिए एक क्षण में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन जानकारी और ज्ञान एक नहीं हैं। ज्ञान के साथ विवेक, संस्कार और संवेदना जोड़ने का काम आज भी शिक्षक ही करता है। इसलिए बदलते समय में शिक्षक की भूमिका कम नहीं हुई, बल्कि और बड़ी हो गई है।
मेरे जीवन में शिक्षक होना किसी पद का नाम नहीं रहा। यह मेरे परिवार से मिली एक सुंदर विरासत है, जिसे मैंने अपने जीवन में अनुभव किया और आज भी अपने साहित्य के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हूँ।
आज शिक्षक दिवस पर मैं अपने दादाजी को याद करती हूँ, जिनसे शिक्षा की प्रेरणा मिली; अपने ताऊजी को याद करती हूँ, जिनसे संगीत और संस्कृति का संस्कार मिला; और उन सभी विद्यार्थियों को भी, जिन्होंने मुझे शिक्षक से एक बेहतर इंसान बनने की सीख दी।
कभी मैं बच्चों को पढ़ाती थी, आज जीवन मुझे पढ़ाता है।
कलम हाथ में है, इसलिए सीखने-सिखाने का सिलसिला आज भी जारी है।
शायद यही शिक्षक होने का सबसे बड़ा अर्थ है—
हम जहाँ भी रहें, अपने ज्ञान, अनुभव और संस्कार से किसी दूसरे के जीवन में थोड़ी-सी रोशनी छोड़ जाएँ।
सुनिता त्रिपाठी ‘अजय’

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