वर्ष 2026 में “नंदा देवी लोकजात” (बड़ी जात) यात्रा 5 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक की जाएगी आयोजित।

हिमालय का महाकुंभ:- “विदा होती ‘ध्याणी’ के अश्रुपूरित पग और आस्था का तुषार-पथ” –योगेश नवानी
उत्तराखंड के अभेद्य और जाज्वल्यमान प्रांगण में इस समय प्रकृति और पुरुष, लोक और परलोक, तथा मानवी संवेदना और दैवीय गरिमा का एक ऐसा विरल समागम चल रहा है, जिसे संपूर्ण विश्व ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ के नाम से पूजता है।
यह केवल एक भौगोलिक पदयात्रा नहीं, अपितु आदि-अनादि काल से चली आ रही लोक-आस्था की वह जीवंत सरिता है, जो कठिन हिमालयी कंदराओं से होकर माँ नंदा को उनके मायके से ससुराल (कैलाश पर्वत) विदा करने की करुणामयी गाथा कहती है।
बारह वर्षों के दीर्घ अंतराल के पश्चात जागृत हुई यह यात्रा उत्तराखंड के सांस्कृतिक अंतःकरण का सबसे स्पंदित और भावुक दस्तावेज़ है।
संवेदना का लोक-साँचा:-“जब ईश्वर बन गई कुलकन्या”
इस पावन भूमि की यह अद्भुत विशेषता है कि यहाँ सर्वशक्तिमान जगदम्बा, महाकाली और साक्षात पार्वती को कोई अमूर्त ईश्वरीय सत्ता मात्र मानकर दूर से नहीं पूजा जाता। वे यहाँ की जनमानस के लिए ‘ध्याणी’ (अर्थात ब्याही गई लाडली बेटी) हैं।
पर्वतीय अंचल का प्रत्येक हृदय इस लोक-पीड़ा से आंदोलित रहता है कि उनकी पुत्री नंदा उस अत्यंत दुर्गम, हिम-आच्छादित और एकाकी कैलाश पर कैसे निवास करती होगी।
जब यह यात्रा प्रारंभ होती है, तो विदाई की वही मर्मभेदी वेदना जो किसी साधारण कन्या की विदाई पर प्रस्फुटित होती है, वह सम्पूर्ण हिमालय की वादियों में गूँज उठती है। विदाई के मांगलिक गीतों में उल्लास कम, अपनों से बिछड़ने का कारुणिक अश्रु-प्रवाह अधिक होता है।
“रूपकुंड का रहस्य और होमकुंड का गंतव्य”:-
लगभग २८० किलोमीटर लंबी इस महायात्रा का मार्ग केवल शारीरिक सहनशीलता की परीक्षा नहीं, वरन आत्मा के शुद्धिकरण का सोपान है। नौटी और कुरुद जैसे पावन ग्रामों से उठी यह यात्रा जब ऊँचाई की ओर बढ़ती है, तो घने देवदार और बुरांश के जंगलों को पीछे छोड़ते हुए मखमली बुग्यालों (अल्पाइन मैदानों) में प्रवेश करती है।
चौसिंगिया खाडू की अलौकिकता:-
इस पूरी यात्रा का सबसे विस्मयकारी और श्रद्धा का केंद्र वह चार सींगों वाला पवित्र मेढ़ा (चौसिंगिया खाडू) है, जिसका जन्म स्वतः ही एक दैवीय संकेत माना जाता है।
माँ की आभूषणों व वस्त्रों से सुसज्जित डोली के आगे-आगे चलता यह मूक पशु किसी कुशल मार्गदर्शक की भाँति बिना किसी बंधन के दुर्गम बर्फीले रास्तों पर आगे बढ़ता जाता है।
रहस्यमयी रूपकुंड:-
१७,००० फीट की उस विरल ऊँचाई पर स्थित जहाँ ऑक्सीजन भी सांसों का साथ छोड़ने लगती है, यात्री रहस्यमयी रूपकुंड के तट पर पहुँचते हैं।
कंकालों की मौन उपस्थिति के बीच से गुजरते हुए, लाटू देवता (नंदा के धर्म-भाई) की छत्रछाया में भक्त आगे का मार्ग तय करते हैं।
होमकुंड का महायोग:-
यात्रा का अंतिम गंतव्य होमकुंड है। यहाँ पहुँचकर महायज्ञ की पूर्णाहूति होती है। यहीं पर वह चौसिंगिया खाडू, जो अब तक यात्रियों का सहचर था, माँ की भेंट और पोटली अपनी पीठ पर लादे इंसानी बस्ती को सदा के लिए छोड़कर हिमशिखरों की ओट में विलीन हो जाता है—एक ऐसा दृश्य जो कठोर से कठोर हृदय को भी रुला देता है।
सांस्कृतिक एकता का सेतु:-
यह यात्रा केवल गढ़वाल या कुमाऊं की पृथक अस्मिता नहीं है, बल्कि यह इन दोनों क्षेत्रों के सांस्कृतिक मिलन का महासेतु है। नंगे पैर, कंटीले और बर्फीले पत्थरों पर चलते लाखों श्रद्धालुओं की आँखों में न तो थकान होती है और न ही भय। वहाँ केवल एक ही तन्मयता होती है—अपनी आराध्या, अपनी बेटी को उसके गंतव्य तक सुरक्षित पहुँचाने की।
रंग-बिरंगी छंतोलियाँ (पारंपरिक छत्र) जब नीले आकाश के नीचे और श्वेत हिमशिखरों के बीच लहराती हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति स्वयं माँ नंदा के स्वागत में चंदोबा तानकर खड़ी हो।
उपसंहार:-
वर्तमान समय में जब आधुनिकता की अंधी दौड़ में मानव अपनी जड़ों को भूलता जा रहा है, उत्तराखंड की यह नंदा देवी राजजात यात्रा वैश्विक समाज को यह संदेश देती है कि प्रकृति से जुड़ाव और लोक-परंपराओं का संरक्षण ही मानवता की वास्तविक धरोहर है।
यह यात्रा केवल पाषाण और बर्फ की डगर को नापना नहीं है; यह तो मानव हृदय की अगाध श्रद्धा, अपरिमेय विश्वास और निश्छल प्रेम का वह अनंत शिखर है जहाँ पहुँचकर मनुष्य स्वयं ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है।
माँ नंदा का यह तुषार-पथ सदियों से मानवता को आलोकित करता रहा है और आगे भी करता रहेगा।
जय माॅं नंदा
हर हर महादेव
–योगेश नवानी
ऋषिकेश उत्तराखंड




