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मेरे शिक्षक श्री श्यामलाल जी संस्मरण – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

 

बचपन की स्मृतियों के पन्ने पलटते ही विद्यालय की वह छोटी-सी कक्षा, लकड़ी की बेंचें, ब्लैकबोर्ड और सामने खड़े मेरे शिक्षक श्री श्यामलाल का चेहरा आज भी आँखों के सामने तैर जाता है। उस समय कहाँ पता था कि कक्षा में कही गई कुछ साधारण-सी बातें आगे चलकर जीवन की बड़ी सीख बन जाएँगी।

एक घटना आज भी मुझे विशेष रूप से याद है। एक दिन गणित की कक्षा में मेरे गणित के अध्यापक श्री श्यामलाल ने बोर्ड पर एक सवाल लिखकर मुझसे उसका उत्तर पूछा। मैं पूरे आत्मविश्वास से उठकर बोर्ड के पास गई और सवाल हल किया। लेकिन मेरा उत्तर गलत था। कक्षा में कुछ बच्चे हँसने लगे। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और मैं चुपचाप अपनी जगह लौटने लगी।

तभी उन्होंने ने मुझे रोककर बड़े स्नेह से कहा—“गलती पर शर्मिंदा मत हो, गलती से सीखो। जो बच्चा प्रयास करता है, वही आगे बढ़ता है।”

उन्होंने मेरे गलत उत्तर को मिटाया नहीं, बल्कि उसी के नीचे सही तरीका समझाया। फिर पूरी कक्षा से कहा—“याद रखिए, गलत उत्तर देने वाला विद्यार्थी असफल नहीं होता; कोशिश करना छोड़ देने वाला असफल होता है।”

उनके ये शब्द मेरे मन में ऐसे बसे कि आज भी किसी काम में असफलता सामने आती है तो वही आवाज भीतर से सुनाई देती है—“कोशिश करना मत छोड़ो।”

तब शिक्षक हमारे लिए केवल पाठ पढ़ाने वाले गुरु थे, लेकिन समय बीतने के साथ समझ आया कि वे हमारे व्यक्तित्व के शिल्पकार थे। उनकी डाँट में अनुशासन था, उनकी मुस्कान में प्रोत्साहन और उनकी सीख में जीवन का अनुभव।

विद्यालय से विदा हुए वर्षों बीत गए, मगर पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों की छाप आज भी मेरे व्यवहार और विचारों में दिखाई देती है। उन्होंने किताबों के पाठ तो पढ़ाए ही, साथ-साथ जीवन का पाठ भी पढ़ाया।

आज शिक्षक दिवस के अवसर पर जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है कि जीवन में मिले अनेक उपहारों में एक अच्छे शिक्षक का मिलना सबसे अनमोल उपहार है।

हमारे बालों में सफेदी आ गई, जीवन की राहें बदल गईं, लेकिन मन के किसी कोने में आज भी वही विद्यार्थी बैठा है, जो अपने शिक्षक श्री श्यामलाल जी की आवाज सुनकर कहता है—

गुरुजी, आपकी वह सीख आज भी मेरे साथ है।

शत-शत नमन उन सभी शिक्षकों को, जिन्होंने हमें केवल पढ़ाया नहीं, बल्कि हमें बेहतर इंसान बनना सिखाया।

प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

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