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मंदोदरी का पति धर्म – डॉ सरिता चौहान प्रवक्ता हिंदी पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गोरखपुर

 

मंदोदरी में पति धर्म निभाया
क्या ही करती वह जब रावण रूपी पति पाया।
अतीव सुंदरी थी वह भी
कोई कमी नहीं थी।
ना कमी थी उसके देह में
ना ही कमी थी रावण के ऐश्वर्य और वैभव में।
रखता तो मंदोदरी को महारानी की तरह।
पर फिर भी मंदोदरी की हृदय को ना समझ सका।
चल पड़ा जगत जननी मां सीता की राह में।
अपने जीवन के प्रकाश को नष्ट कर अंधकार का रास्ता चुन लिया।
क्योंकि वह नारी का सम्मान भूल गया।
वह भूल गया की सीता जगत जननी आदिशक्ति अवतारी हैं।
राजा जनक जी की राजकुमारी हैं
और
परम प्रतापी पुरुषों में उत्तम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी की हृदय राज्य की रानी हैं।
सुनी है कि बड़ा ज्ञानी था रावण, पर अहंकार कहे या असंतोष।
मैं इस अहंकार नहीं मानती,
अगर रावण को अहंकार ही मिटाना था तो वह श्री राम से अहंकार दिखा सकता था,
वह बीच में क्यों मां सीता को ले आया,
क्यों किया छल कपट मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी के साथ
और अपनी रानी मंदोदरी के भी साथ।
क्या रावण का यही अहंकार था कि वह स्त्री के लिए ही युद्ध करता।
अरे इतना ही अहंकारी था तो अपनी स्त्री का सम्मान बचाता।
क्यों अपनी स्त्री को छोड़ (छोड़ने का मतलब राजमहल से निकलना ही नहीं)।
चल पड़ा पराई स्त्री की राह में।
क्या यही उसका अहंकार था।
मेरी समझ से यह उसकी अज्ञानता, धृष्टता और दुष्टता थी।
आज भी इस समाज में पड़े हुए हैं अनेक ऐसे आनाचारी,
जया समझ बैठे हैं कि,मैं तो स्त्री का भरण- पोषण कर ही रहा हूं,
इसके बाद मैं स्वतंत्र हूं। हमारा समाज स्त्री को एक बोझ नहीं समझता जो अपने पति से सिर्फ भरण पोषण की उम्मीद रखे।
हर स्त्री सम्मान की आकांक्षी होती है।
वह अपने पति से विश्वास के धागे में बंधी होती है,
सिर्फ भरण -पोषण के बंधन में नहीं।
पता नहीं कहां से लाया गया है भरण- पोषण वाला शब्द।
स्त्री के सम्मान रूपी शब्द की कुंजी में तो यह बिल्कुल भी नहीं है।
ईश्वर ने उसके भी दो पैर दो हाथ आंख का नाक दिए हैं।
वह काम भी कर सकती है सुन सकती है समझ सकती है अपने बारे में सोच सकती है।
पर वह तो सिर्फ अपने पति के हित के बारे में ही सोचती अपनी उम्र गुजार देता है।
यही है उसकी सबसे बड़ी कमजोरी
और
भारतीय नारी की सबसे बड़ी विशेषता।
फिर भी हमें भारतीय नारी होने का गर्व है।
मैं गर्व की अनुभूति कर रही हूं, वह इस मामले में,
कहीं पर मंदोदरी कहीं पर मां जगत जननी सीता कहीं पर राधा कहीं पर श्यामा कहीं पर मीरा कहीं पर गोपी, कहीं द्रौपदी, कहीं अहिल्या।
नारी अपनी सतह से लेकर सृष्टि तक है प्रतिष्ठित।
धरती से लेकर स्वर्ग तक हर जगह गूंजायमान है। इसीलिए शास्त्रों में कहा गया है–
तुम्हारे हर स्व में नारी है।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान प्रवक्ता हिंदी पीएम श्री एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गोरखपुर

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