सफ़र में महिलाओं की विवशता और समाज की संकीर्ण सोच – कविता साव पश्चिम बंगाल

एक संवेदनशील सामाजिक प्रश्न, जिस पर बात करना ज़रूरी है
हम अक्सर महिला सम्मान, महिला सुरक्षा और समानता की बातें करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी उन छोटी-छोटी परेशानियों पर गंभीरता से विचार किया है, जिनका सामना महिलाओं को रोज़मर्रा के जीवन में करना पड़ता है? यात्रा के दौरान शौचालय की अनुपलब्धता ऐसी ही एक समस्या है, जो महिलाओं की गरिमा, स्वास्थ्य और सहज जीवन से जुड़ी हुई है।
सड़क पर लंबा सफ़र हो, रेलगाड़ी की यात्रा हो या निजी बस का घंटों का सफ़र—पुरुषों और महिलाओं की परिस्थितियों में एक बुनियादी अंतर दिखाई देता है। पुरुषों को कई बार अपनी प्राकृतिक आवश्यकता पूरी करने के लिए कोई न कोई रास्ता मिल जाता है, लेकिन महिलाओं के सामने सुविधा के अभाव के साथ-साथ सामाजिक दृष्टि और सुरक्षा की चिंता भी खड़ी रहती है।
एक महिला अपनी प्राकृतिक आवश्यकता पूरी करने के लिए किसी सुरक्षित स्थान की तलाश करती है, तो उसे कितनी बातों का ध्यान रखना पड़ता है! आसपास कौन है, कोई उसे देख तो नहीं रहा, उसकी गरिमा सुरक्षित रहेगी या नहीं—इन तमाम आशंकाओं के बीच उसे अपनी बुनियादी आवश्यकता के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। विडंबना देखिए कि ऐसी विवशता में भी कुछ लोगों की निगाहें सहानुभूति के बजाय संदेह और उपहास से भरी होती हैं।
आखिर किसी महिला की मजबूरी लोगों के लिए कौतूहल का विषय क्यों बन जाती है?
क्या प्राकृतिक आवश्यकता पूरी करना कोई अपराध है? क्या केवल महिला होने के कारण उसे अपनी सहज शारीरिक ज़रूरत के लिए शर्मिंदगी झेलनी चाहिए? यदि कोई महिला एकांत और सुरक्षित स्थान की तलाश में है, तो उसकी परिस्थिति को समझने के बजाय उसे घूरना किस प्रकार की सामाजिक मानसिकता का परिचायक है?
समस्या केवल सड़क मार्ग तक सीमित नहीं है। लंबी रेल यात्राओं में शौचालयों की अपर्याप्त सफ़ाई, पानी की कमी और रखरखाव में लापरवाही यात्रियों की परेशानी बढ़ाती है। निजी बसों में भी स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था या रास्ते में निर्धारित ठहराव का अभाव महिलाओं के लिए यात्रा को कठिन बना सकता है। जिन सुविधाओं को बुनियादी आवश्यकता माना जाना चाहिए, उनके लिए महिलाओं को बार-बार समझौता करना पड़ता है।
इसका प्रभाव केवल असुविधा तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक पेशाब रोकने से मूत्र संबंधी परेशानी बढ़ सकती है और कुछ परिस्थितियों में मूत्र मार्ग के संक्रमण का जोखिम भी प्रभावित हो सकता है। गंदे शौचालयों के कारण स्वच्छता संबंधी चिंताएँ अलग से बनी रहती हैं। इसलिए यह विषय केवल सुविधा का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी है।
यहाँ एक प्रश्न प्रशासन और परिवहन व्यवस्था से भी है। जब सड़कों, रेलवे स्टेशनों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर यात्रियों की सुविधा के लिए योजनाएँ बनाई जाती हैं, तो महिलाओं की आवश्यकताओं को प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती? केवल शौचालय बना देना पर्याप्त नहीं है; उनका नियमित रखरखाव, पर्याप्त पानी, स्वच्छता, सुरक्षित प्रवेश और उपयोग योग्य स्थिति में उपलब्ध रहना भी उतना ही आवश्यक है। लंबी दूरी की बसों में निर्धारित अंतराल पर स्वच्छ शौचालयों वाले स्थानों पर ठहराव सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है।
साथ ही, समाज को अपनी दृष्टि और सोच में बदलाव लाना होगा। किसी महिला को असहज परिस्थिति में देखकर उसे घूरना, उस पर टिप्पणी करना या उसकी विवशता को चर्चा का विषय बनाना संवेदनहीनता है। हमें यह समझना होगा कि सम्मान का अर्थ केवल बड़े-बड़े भाषण देना नहीं, बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति की परिस्थिति को समझना और उसकी गरिमा की रक्षा करना भी है।
महिलाओं की समस्या का समाधान उनसे अधिक सहनशील होने की अपेक्षा करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें उन्हें अनावश्यक पीड़ा न सहनी पड़े। सार्वजनिक सुविधाओं की योजना बनाते समय महिलाओं, बच्चों, बुज़ुर्गों और दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
आइए, इस विषय को संकोच या उपहास की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और नागरिक जिम्मेदारी के रूप में देखें। अपनी बेटियों, बहनों, माताओं और सहयात्रियों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करें, जहाँ सफ़र के दौरान उन्हें अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए विवश न होना पड़े।
नज़र महिला की मजबूरी पर नहीं, अपनी सोच पर डालिए।
महिला की प्राकृतिक आवश्यकता अशोभनीय नहीं है; अशोभनीय है उसकी विवशता का मज़ाक उड़ाना।
महिलाओं को शर्मिंदगी नहीं, सम्मान दीजिए।
ताना नहीं, सुविधा दीजिए।
केवल आश्वासन नहीं, स्वच्छ और सुरक्षित शौचालय दीजिए।
क्योंकि एक सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों और चौड़ी सड़कों से ही नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह अपने प्रत्येक नागरिक की बुनियादी आवश्यकताओं और मानवीय गरिमा का कितना ध्यान रखता है।
आइए, इस मुद्दे पर खुलकर बात करें और बदलाव की शुरुआत अपनी सोच से करें।
— एक संवेदनशील सामाजिक सरोकार
कविता साव
पश्चिम बंगाल




