पिता आसमान है – रमेश शर्मा

मेरा बस जन्म ही हुआ था शायद एक दो महीने का रहा हूंगा जैसा कि मेरी माता जी ने बताया। हम चार भाई बहन और पिताजी जी बिजली बोर्ड में यू डी सी के पद पर जयपुर में कार्यरत थे।
राजस्थान में पंचायत संस्थान विभाग नया नया बना था। सभी विभागों से कर्मचारी उसमें जा सकते थे। आगे अच्छे भविष्य की संभावना देखते हुए पिता जी ने भी इस विभाग में सहायक ब्लॉक अधिकारी के रूप में जोइन किया और अलवर जिले के मंडावर तहसील में कार्य भाग संभाला। पंद्रह दिन से पिताजी जयपुर आ जाते थे। एक शनिवार शाम दिल्ली से जयपुर आने वाली ट्रेन में मंडावर स्टेशन पर पहुंचे तो ट्रेन जाने को तैयार थी उसमें अंतिम गार्ड के डिब्बे के पास चढ़े लेकिन पैर फिसल कर पायदान में फंस गया और वही दायीं तरफ का पैर घुटने से नीचे कट गया। उन्हें अलवर जिला अस्पताल में ले जाया गया।
वहाँ बीस दिन रहे फिर उन्हें पूना मिल्ट्री हास्पिटल में भेजा गया और उनके कृत्रिम पैर लगाया गया।
वहाँ से वापस आकर पिताजी ने अपने मूल विभाग बिजली बोर्ड में जोइन किया। अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर साइकिल चलाना कृत्रिम पैर के साथ सीखकर अपनी नौकरी पूरी की।
आज सोचता हूँ तो सिहर जाता हूँ कि उन्होंने किन कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए अपने परिवार को पाला। हजारों लोगों में से चंद लोग इतना साहस जुटा पाते हैं।
मेरे पिताजी हमारे लिए भगवान से भी बढ़ कर थे। और पिता आसमान है इस कहावत को चरितार्थ किया। उन्होंने नब्बे साल की उम्र में शरीर त्यागा।
उन्हें शत शत नमन
रमेश शर्मा




