प्रकृति प्रणय — प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या

प्रकृति यह शब्द सुनते ही जैसे मन में एक मधुर संगीत गूंज उठता है। चारों ओर हरियाली, नीला आकाश, पर्वतों की भव्यता, नदियों की कलकल, फूलों की मुस्कान और पवन की मृदुल छुअन—सब मिलकर जीवन में प्रेम का नया अर्थ गढ़ते हैं। यही तो प्रकृति का प्रणय है , निःस्वार्थ, निःशब्द और अनंत।जब भोर की पहली किरण धरती के आँचल को चूमती है, तो वह क्षण मानो प्रेम का पहला स्पर्श होता है। ओस की बूँदें जैसे प्रकृति की आँखों का काजल बनकर पत्तियों पर ठहर जाती हैं। हवा का झोंका किसी प्रिय के संदेश की तरह तन-मन को स्पर्श करता है। पक्षियों के गीतों में प्रणय की कोमल फुसफुसाहट सुनाई देती है।वसंत जब आता है, तो प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में सजती है। वृक्षों पर नये पत्ते, फूलों की मुस्कान और खेतों में लहराती फसलें,सब मिलकर जैसे प्रेम का उत्सव मना रहे हों। पर्वत स्थिर हैं, परंतु उनके भीतर बहती नदियाँ जैसे उनके हृदय की धड़कन हों। चाँद जब रात के अंधकार में झिलमिलाती झील में अपना रूप देखता है, तो लगता है,प्रकृति स्वयं अपने सौंदर्य से प्रेम करती है। प्रकृति और प्रणय दोनों शब्द एक दूसरे के पूरक हैं।मानव और प्रकृति का संबंध भी इसी प्रेम से जुड़ा है। जब मनुष्य प्रकृति से जुड़ता है, तो उसकी आत्मा में शांति उतर आती है। पेड़ों की छाया, नदी की सरगम, और मिट्टी की सोंधी खुशबू,सब उसे उसके मूल से जोड़ देते हैं। लेकिन जब वह इस प्रेम को भुला देता है, तो धरती रूठ जाती है, आकाश म्लान हो जाता है और हवाओं में करुणा की पुकार सुनाई देती है।प्रकृति का प्रणय सिखाता है , प्रेम वह नहीं जो कहा जाए, बल्कि वह है जो महसूस किया जाए। यह वह अनकहा संवाद है, जहाँ हर पत्ता, हर लहर, हर बयार प्रेम का संदेश लेकर चलती है। जो इस प्रणय को समझ लेता है, वह जीवन के सच्चे अर्थ को पा लेता है , क्योंकि प्रकृति प्रणय ही सृष्टि का सबसे सुंदर उपहार है।
प्रवीणा सिंह राणा प्रदन्या




