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आंचल  — नीलम सोनी

आंचल शब्द में पूरी दुनिया कायनात सिमटी हुई है। बचपन में पैदा होते ही। मां का आंचल में पले बढे। कुछ भी होता मां उस आंचल से हमे प्यार से छुपा लेती थी। धूप में मां का आंचल एक छतरी का काम करता है। बच्चा अपने मां का आंचल पकड़ के चलता है तो अपने आप को दुनिया का बादशाह समझता है। दुनिया का कोई एसी इतनी ठंडक नई देता।जितना मां के आंचल से किया पंखा ठंडा करता है। भगवान भी तरसते है ।मां के आंचल के लिए। ऋणी हु में उस मां का जिसने दुनिया में मुझे लाई। ममता के आंचल में सुलाया बोलना चलना जीना सिखाया । अपने आंचल में छुपा लो मेरी मां। आज बहुत थक गई तेरी बेटी। सुला दो मेरी मां।तेरे आंचल में । दुनिया मुझे मिल जाती मेरी मां।
नीलम सोनी

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