लेख -जीवन और मृत्यु के बीच आत्मा का संघर्ष — पल्लवी राजू चौहान कांदिवली, मुंबई

इस संसार में कई खोज किए गए। कई दावे किए गए, परंतु आज तक किसी भी वैज्ञानिक ने यह दावा नहीं किया है कि मृत्यु के बाद लोग कहां जाते हैं? जीवन और मृत्यु एक ऐसी सच्चाई है, जिसकी खोज आज तक नहीं की जा सकी है।
गरुड़ पुराण में जीवन, मृत्यु और मृत्यु के बाद की स्थिति का वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि परलोक एक यात्रा है। यह यात्रा आत्मा भौतिक शरीर का त्याग करने के बाद करती है। मनुष्य मानव शरीर का त्याग करने के पश्चात सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है। मनुष्य ने पूरे जीवन में जो भी अच्छे बुरे कर्म किए होते हैं, उसे उसी आधार पर मृत्यु के दौरान उसी प्रकार की पीड़ा और दर्द से गुजरना पड़ता है। मृत्यु के पश्चात मानव की आत्मा मृत्यु के देवता यम से मिलती है, जिन्हें उनके कर्म के आधार पर विभिन्न यातनाएं झेलनी पड़ती है और कर्म के अनुरूप ही उन्हें योनियां प्राप्त होती है। यह तो बात गरुड़ पुराण की थी
आपने देखा होगा कि जब भी किसी व्यक्ति का अंतिम समय आता है, वह तरह तरह की यातनाओं को झेलता है। यातनाओं से तात्पर्य है शारीरिक रोग से होनेवाली पीड़ा, घबराहट, बेचैनी, व्याकुलता। यह सारी स्थिति एक रोगी के लिए आम बात है। जब रोगी धीरे-धीरे खाना पीना छोड़ देता है या उसके शरीर के मुख्य अंग काम करना बंद कर देते हैं, तो उसे वेंटीलेटर पर डाल देते हैं। रोगी का शरीर सुई से छलनी होने लगता हैं, वेंटीलेटर के कारण गले से लेकर अंतड़ी तक छिल जाती है। रोगी का शरीर इतनी यातनाएं झेल चुका होता है कि उसकी आत्मा शरीर से बाहर आने के लिए छटपटाने लगती है। आत्मा को भी उस शरीर को छोड़ने में बहुत कष्ट होता है, क्योंकि रोगी के परिजन अपने प्रिय हितैषी को छोड़ना नहीं चाहते, वे अंतिम क्षण तक रोगी को बचाने का भरसक प्रयास करते हैं। इस संघर्ष में आत्मा विचलित हो जाती है। जीवन और मृत्यु के संघर्ष में मानव शरीर और आत्मा दोनों करोड़ों कष्ट झेलते हैं। ऐसा कहा गया है “आत्मा जब शरीर छोड़ती है तो करोड़ों बिच्छुओं के डंक के बराबर पीड़ा होती है।”आत्मा शरीर को छोड़कर जाने के लिए तत्पर रहती है।
अतः कहने का तात्पर्य यह है कि हमें अपने कर्मों का अच्छा या बुरा फल हमें इसी धरती पर ही भोगकर जाना होता है। यही सृष्टि का नियम है।
लेखिका : पल्लवी राजू चौहान
कांदिवली, मुंबई




