औरत ग्रहण — नीलम सोनी

नारी ग्रहण का दूसरा नाम ।दुनिया में चांद सूरज पे तो थोड़े टाइम के लिए ग्रहण लगता है।पर नारी की पूरी अपनी जिंदगी केवल ग्रहण में ही निकलती है। वो पूरी जिंदगी केवल ग्रहण हि करती रहती है। चाहे वो दुख हो सुख हो । किसी की पीड़ा हो ।किसी के आशु हो किसी की खरी कोटि बाते हो।उसका ग्रहण कभी खत्म ही नहीं होता।। माना की नारी को भगवान ने सर्वोच्च स्थान दिया है। भगवान ने भी नारी के साथ बहुत पक्षपात किया है।औरत अपना सब कुछ अपनो के लिए जोख देती है। फिर भी कहा कमी रह जाती है। हर रिश्तों में जान डाल देती है। अपने सपनो को भूलकर दूसरों की ख्वाइशों को पूरा करती है। सूरज की किरणों के संग जगती । पूरे दिन दूसरे के सपनों के पीछे भागती। ना थकती है ना रुकती है । सबके सो जाने के बाद सोती है। सब कुछ करती है। फिर भी कमी कहा रह जाती है।
औरत कभी खिलौना नहीं होती है मौत के मुंह में से भी जाकर दूसरा जन्म देती है। औरत सीता हो या सती अंत में सताई हो जाती है।एक औरत ही होती है जो अपने दर्द को ताकत में बदल देती है। औरत को घर की इज्जत कहा जाता फिर क्यों घर के लोग ही इज्जत देना भूल जाते। औरत जितनी बाहर से शांत नजर आती है। उतना अन्दर से उसके मन में तूफान उठता रहता है। औरत की खामोशी को उसकी कमजोरी नहीं समझना चाहिए। ये आने वाले सैलाब की निशानी होती है। उसके मन में हजारों सवाल उठते रहते है। में लिख भी पाऊं तो भी खुद को ही लिख पाऊंगी। खुद के हिस्से का दर्द,तकलीफ ग़म सब लिखूंगी।
वो मायूसी भरे हुए दिन रोती हुई राते लिखूंगी। कुछ ख्वाब अधूरे, कुछ शिकायतें लिखूंगी। कुछ शोर अपना कुछ सन्नाटे लिखूंगी। जिंदगी में कुछ भी लिखूं तो अपने बारे में लिखूंगी।
नीलम सोनी




