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आलेख—दोस्ती अनमोल – डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

 

रामू, श्यामू दोनों मित्र थे, एक साथ पढ़ाई करते थे एक ही विद्यालय में।
रामू के पिता इंजीनियर थे अच्छे पैसे वाले परिवार का बेटा था। श्यामू गरीब परिवार में पला हुआ एक किसान का बेटा।
रामू आए दिन अच्छे कपड़े पहन कर आता था और श्यामू जो था वह गरीबी के अनुसार ,उसकी वेशभूषा होती थी।
रामू अपने दोस्त श्यामू की मदद करता था, और उसके लिए अपने कपड़ों मे से चुपचाप लाकर पहनने को दिया करता था। श्यामू खाने में चटनी रोटी गरीबों के हिसाब से लाता था। रामू श्यामू के लिए अच्छे-अच्छे व्यंजन खाने को देता था।
श्यामू के पास पढ़ाई के लिए किताबें भी नहीं होती थी, वह लाकर के चुपचाप- चुपचाप अपनी किताबें दिया करता था।
एक बार रामू कहीं बाहर चला गया और श्यामू को अपनी फीस जमा करनी थी। श्यामू के पास पैसे नहीं थे, वह बड़ा परेशान था और उसका नाम काट दिया गया। रामू जब स्कूल आया पता लगा कि श्यामू आता नहीं है स्कूल क्योंकि नाम कट गया।
चुपचाप से रामू ने श्यामू की फीस जमा करके तुरंत दोबारा नाम लिखवा दिया।
श्यामू के घर टीचर के द्वारा फोन किया कि आप स्कूल आइए पिता केसाथ।
स्कूल पहुंचने पर पता लगा कि रामू ने श्यामू की फीस देकर के उसका नाम दोबारा लिखवा दिया, यह देखकर के श्यामू बहुत प्रसन्न हुआ।
रामू ने अपने मित्र की मदद की सभी शिक्षकों ने और श्यामू के पिता ने और रामू के पिता ने भी रामू को शाबाशी दी।
सच्चा मित्र ऐसा ही होना चाहिए, जो परेशानी के समय मित्र की मदद कर सके।

डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

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