सादगी, ईमानदारी और अजेय इच्छाशक्ति की मिसाल: गांधी और शास्त्री’

महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री दोनों ही भारत के ऐसे महान सपूत हैं, जिनका जीवन खुलीं किताब की तरह माना जाता है। इसके बावजूद, उनके जीवन से जुड़े कुछ ऐसे अनछुए और कम चर्चित पहलू हैं, जिनसे आम तौर पर लोग अनजान हैं! महात्मा गांधी से जुड़ा अनसुना पहलू: ‘अहिंसा’ का गणितीय और अनूठा विचार:- हम सब जानते हैं कि गांधी जी ने पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाया, लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि वे अहिंसा को एक कमज़ोरी नहीं बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा सक्रिय और आक्रामक( प्रोटेक्टिव ) हथियार मानते थे।
उनका मानना था कि शारीरिक हिंसा करने वाला व्यक्ति डर के कारण हिंसा का सहारा लेता है, जबकि एक सच्चा अहिंसक व्यक्ति वह है जो भीतर से पूरी तरह निडर हो।
उनका यह भी मानना था कि यदि अहिंसा और कायरता के बीच किसी एक को चुनना हो, तो वे हिंसा को चुनना पसंद करेंगे, क्योंकि कायरता सबसे बड़ा पाप है। वे अहिंसा को कोई निष्क्रिय (पेसिव)उपदेश नहीं, बल्कि अन्याय के ख़िलाफ़ सबसे तेज़ गति से लड़ने वाली आध्यात्मिक तक़नीक मानते थे।
लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ा अनसुना पहलू:अनोखा ‘ऋण’ और ईमानदारी की मिसाल:-
शास्त्री जी की सादगी जग जाहिर है, लेकिन उनके जीवन की एक घटना उनकी ईमानदारी की ऐसी पराकाष्ठा है, जिससे बहुत कम लोग वाक़िफ हैं।
जब वे भारत के प्रधानमंत्री थे, तब उनके बेटे सुनील शास्त्री को एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला लेना था और उनके पास दाखिले की फीस (शायद कुछ सौ रुपये) जमा करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे।उनके एक क़रीबी सहयोगी ने जब यह बात सुनी, तो उन्होंने तुरंत प्रधानमंत्री राहत कोष या अपनी तरफ़ से पैसों की मदद का प्रस्ताव रखा। लेकिन शास्त्री जी ने साफ़ मना कर दिया और कहा कि “मेरे पास अभी पैसे नहीं हैं, इसलिए मैं बैंक से लोन (ऋण) लूंगा और जब मेरी तनख़्वाह आएगी, तब उसे चुकाऊंगा।” एक देश का प्रधानमंत्री अपने बेटे की पढ़ाई के लिए बैंक से कर्ज ले,ऐसी ईमानदारी का उदाहरण राजनीति में शायद ही कभी दूसरा मिले। इन दोनों महान विभूतियों की एक और ख़ास बात यह है कि इन दोनों का जन्मदिन एक ही दिन यानी 2 अक्टूबर को आता है, जो दुनिया में अपने आप में एक अनोखा इत्तेफ़ाक है।
-डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’




