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माँ कालरात्रि – सुनीता तिवारी सरस

माँ कालरात्रि
कहानी

रात का अँधेरा मुझे हमेशा डराता था। बचपन से ही मेरे मन में एक अनजाना भय पलता रहा था। अकेले चलने से डर लगता, कठिन परिस्थितियों का सामना करने से डर लगता और सबसे अधिक डर लगता था लोगों के सामने अपनी बात रखने से। मुझे लगता था कि मैं कमजोर हूँ, जीवन की चुनौतियों से लड़ नहीं सकती। जब भी कोई मुश्किल सामने आती, मैं अपने कदम पीछे खींच लेती।

लोग मेरी चुप्पी को मेरी कमजोरी समझते थे। कोई मेरी भावनाओं का मजाक उड़ाता, तो कोई मेरे आत्मविश्वास पर सवाल उठाता। मैं सब कुछ सहकर भी मुस्कुराने का प्रयास करती, लेकिन भीतर ही भीतर मेरा मन भय की बेड़ियों में जकड़ता जा रहा था।

एक दिन जीवन ने मुझे ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ मेरे सामने दो ही रास्ते थे या तो भय के आगे घुटने टेक दूँ, या फिर अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचानूँ।

उस दिन नवरात्रि की सप्तमी थी। मंदिर में माँ कालरात्रि की पूजा हो रही थी। माँ का श्याम वर्ण, खुले केश, तेजस्वी नेत्र और उनके हाथों में अस्त्र-शस्त्र देखकर मैं कुछ क्षण ठहर गई। उनके स्वरूप में एक विचित्र आकर्षण था। उनका रूप भले ही उग्र था, लेकिन उस उग्रता में भी भक्तों के लिए अभयदान छिपा था।

मैंने माँ के चरणों में सिर झुकाकर पूछा, “हे माँ! जब आप इतनी शक्तिशाली हैं, तो फिर मेरे मन में इतना भय क्यों है? मैं कब तक अपनी कमजोरियों से हारती रहूँगी?”

मंदिर की घंटियों की ध्वनि मेरे कानों में गूँज उठी। ऐसा लगा, मानो माँ मुझसे कह रही हों “बेटी, भय का होना कमजोरी नहीं है। भय के कारण अपनी शक्ति को भूल जाना कमजोरी है। अँधेरे से भागने के बजाय अपने भीतर साहस का दीप जलाना सीखो। मैं कालरात्रि हूँ। अँधकार का नाश करना ही मेरा स्वरूप है।”

उन क्षणों में मेरे मन के भीतर कुछ बदलने लगा।

मैंने समझ लिया कि माँ की आराधना केवल उनके सामने दीप जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान, निराशा और डर को मिटाना भी है। माँ कालरात्रि हमें सिखाती हैं कि कठिन समय से घबराना नहीं चाहिए। जिस भय को हम अपनी सबसे बड़ी बाधा समझते हैं, वही हमारे साहस को जगाने का कारण बन सकता है।

उस दिन के बाद मैंने अपनी सोच बदलनी शुरू कर दी। जहाँ पहले मैं अन्याय के सामने चुप हो जाती थी, वहाँ अब विनम्रता के साथ अपनी बात रखने लगी। जहाँ कठिनाइयों से भागती थी, वहाँ उनका सामना करने का प्रयास करने लगी। असफलता का डर अब मुझे रोकता नहीं था, बल्कि बेहतर बनने की प्रेरणा देता था।

मेरी समस्याएँ रातोंरात समाप्त नहीं हुईं, लेकिन उन्हें देखने का मेरा नजरिया बदल गया। अब मैं जानती थी कि साहस का अर्थ भय का पूरी तरह मिट जाना नहीं, बल्कि भय के होते हुए भी सही कदम उठाना है।

धीरे-धीरे वही डर, जो कभी मेरी राह रोकता था, मेरी शक्ति बन गया। मेरी चुप्पी ने आवाज पाई, मेरी झुकी हुई दृष्टि में आत्मविश्वास आया और मेरे कदमों में दृढ़ता आ गई।

आज जब भी जीवन में अँधेरा घिरता है, मैं माँ कालरात्रि को याद करती हूँ। उनके चरणों में शीश झुकाकर स्वयं से कहती हूँ, अँधेरा कितना भी गहरा क्यों न हो, भीतर विश्वास का दीप जलता रहे तो राह अवश्य मिलती है।

माँ कालरात्रि ने मुझे यह नहीं सिखाया कि जीवन में कभी डरना मत, बल्कि यह सिखाया कि अपने डर को अपनी हार मत बनने देना।

अब मेरा भय मेरी कमजोरी नहीं, मेरी शक्ति है। क्योंकि मैंने जान लिया है कि जिस दिन इंसान अपने भीतर के अँधेरे से लड़ना सीख जाता है, उसी दिन उसके जीवन में नई सुबह का जन्म होता है।

जय माँ कालरात्रि!

माँ, मेरे मन से भय मिटाकर मुझे इतना साहस देना कि मैं हर कठिन परिस्थिति में सत्य, स्वाभिमान और विश्वास के मार्ग पर अडिग रह सकूँ।

सुनीता तिवारी”सरस”

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