आभा-मंडल (आलेख) — कविता साव

आभा-मंडल का अर्थ है किसी व्यक्ति, देवता, महापुरुष या वस्तु के चारों ओर फैली हुई अदृश्य परंतु प्रभावशाली प्रकाश-ज्योति। यह प्रकाशमंडल किसी की आंतरिक शक्ति, पवित्रता, चरित्र और आध्यात्मिक तेज का प्रतीक माना जाता है। भारतीय संस्कृति, साहित्य और कला में आभा-मंडल का विशेष महत्व है।
आभा-मंडल सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देता, किंतु धार्मिक ग्रंथों, चित्रकला और मूर्तिकला में इसे विशेष रूप से दर्शाया गया है। इसे अक्सर सुनहरी, नीली, श्वेत या रश्मियों से युक्त प्रभामंडल के रूप में चित्रित किया जाता है। जब किसी संत, देवता या महापुरुष का चित्र बनता है तो उनके सिर या शरीर के चारों ओर चमकदार आभा-मंडल अवश्य दर्शाया जाता है।
आभा-मंडल व्यक्ति के आत्मिक बल और तपश्चरण का प्रतीक है।
संतों और ऋषियों का आभा-मंडल उनकी साधना और तप की गहराई बताता है।
देवताओं के आभा-मंडल से उनकी दिव्यता झलकती है।
राजा-महाराजा या महापुरुषों का आभा-मंडल उनके प्रभाव और करुणामयी हृदय का द्योतक होता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से
आभा-मंडल को आधुनिक विज्ञान “ऑरा” (Aura) कहता है। यह शरीर से निकलने वाली सूक्ष्म ऊर्जा है, जिसे विशेष उपकरणों और तकनीकों से मापा जा सकता है। यह ऊर्जा व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्थिति का दर्पण होती है। सकारात्मक भावनाओं वाले व्यक्ति का आभा-मंडल उज्ज्वल और आकर्षक होता है, जबकि नकारात्मक विचारों वाला व्यक्ति धुंधला या मलिन आभा-मंडल रखता है।
सांस्कृतिक और कलात्मक दृष्टिकोण से यह
भारतीय मंदिरों की मूर्तियों, बौद्ध चित्रों और जैन प्रतिमाओं में आभा-मंडल प्रमुख रूप से अंकित होता है। ईसाई चित्रकला में भी मसीह और संतों के सिर के चारों ओर प्रभामंडल दर्शाया जाता है। यह परंपरा विश्व के अनेक धर्मों और संस्कृतियों में समान रूप से दिखाई देती है।
आभा-मंडल केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं, बल्कि यह आत्मिक ऊँचाई और दिव्यता का दर्पण है। यह व्यक्ति के भीतर छिपी अच्छाई, पुण्य और साधना का प्रभाव है, जो बाहर प्रकाश के रूप में झलकता है। अतः हर मनुष्य को अपने आचरण और विचारों से ऐसा जीवन जीना चाहिए जिससे उसका आभा-मंडल उज्ज्वल बने और समाज में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार हो।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




