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संस्मरण : प्रकृति का सानिध्य — कविता साव पश्चिम बंगाल

दिनांक 1 जनवरी,
नव वर्ष की पहली भोर थी। धूप अभी-अभी रात की ठिठुरन को विदा कह रही थी। पहाड़ों की गोद में फैली झील शीशे की तरह शांत थी, मानो आकाश अपने नीले स्वप्न उसमें उतार रहा हो। झील के किनारे खड़े वृक्षों की परछाइयाँ जल में डोलती थीं, जैसे समय स्वयं ठहरकर साँस ले रहा हो।
जंगल की ओर बढ़ते ही पत्तों की सरसराहट ने स्वागत किया। हवा में मिट्टी की सोंधी गंध थी—जीवन की आदिम पहचान। पक्षियों की चहचहाहट किसी अनकहे उत्सव का उद्घोष कर रही थी। कहीं दूर से बहती निर्झरिणी का स्वर सुनाई देता, जो हर क्षण स्मरण कराता कि बहना ही जीवन है।
थोड़ा आगे खेत-खलिहान मिले। ओस से भीगी फसलों पर उगता सूरज सुनहरा आश्वासन बनकर उतर रहा था। हल की लकीरों में किसान की उम्मीदें लिखी थीं—श्रम, धैर्य और विश्वास। पुआल की गंध, गीली मेड़ों की ठंडक और खुले आकाश का विस्तार—सब मिलकर मन को सरल और शुद्ध बना रहे थे।
उस दिन प्रकृति केवल दृश्य नहीं थी, वह संगिनी थी। उसके सानिध्य में मन हल्का हुआ, स्मृतियाँ उजली हुईं और भीतर एक शांत संकल्प जन्मा—कि जीवन की आपाधापी में भी, इस मौन-सौंदर्य को बार-बार याद रखा जाए। क्योंकि प्रकृति के पास लौटना, स्वयं के पास लौटना है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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