त्योहारों को मनाने के कारण से जानें, ना कि मनाने के तरीके से — ओम कुमावत
फाल्गुन की हवा में जब रंग घुलने लगते हैं, तब हर गली और हर मोहल्ला “होली है!” की ध्वनि से गूंज उठता है। होली का उत्साह अपने चरम पर होता है। रंगों की उड़ती छवियाँ, पिचकारियाँ और हँसी-मज़ाक से भरे संदेश चारों ओर दिखाई देने लगते हैं। पर क्या हमने कभी यह विचार किया है कि क्या होली केवल रंगों का त्योहार है? या फिर रंग तो उस आनंद को व्यक्त करने का एक माध्यम मात्र हैं ? होली की जड़ें उस कथा में हैं जहाँ भक्त प्रह्लाद की अटूट आस्था ने अहंकार और अत्याचार को पराजित किया। होलिका दहन केवल अग्नि प्रज्वलन की परंपरा नहीं, बल्कि यह बुराई के अंत और सत्य की विजय का प्रतीक है। रंगों से खेलना उस विजय की प्रसन्नता है, उसका कारण नहीं। यदि आने वाली पीढ़ी केवल रंग देखेगी और कथा नहीं जानेगी, तो त्योहार का सार धीरे-धीरे लुप्त हो जाएगा। यही भूल हम अन्य त्योहारों में भी कर रहे हैं होली की भाँति जब दिवाली आती है, तो अधिकतर शुभकामनाओं में पटाखों और दीपों की झिलमिलाहट दिखाई देती है। परंतु आने वाली पीढ़ी दीवाली का अर्थ केवल पटाखे और दीपक ही न समझे। उन्हें यह भी ज्ञात हो कि भगवान श्रीराम ने दशहरे के दिन रावण का वध किया और अठारह दिन पश्चात अयोध्या लौटे। यह भी जानना आवश्यक है कि कैसे वीरान हुई अयोध्या में प्रभु श्री राम और लक्ष्मी स्वरूपा माता सीता का पुनः प्रवेश हुआ। उनके स्वागत में दीप प्रज्वलित किए गए। वह केवल प्रकाश नहीं था, वह आशा, विश्वास और धर्म की पुनः स्थापना का प्रतीक था।उसके पश्चात जो युग आया, उसे सुख, समृद्धि और न्याय के प्रतीक “रामराज्य” के नाम से जाना गया। दीवाली का अर्थ केवल उत्सव नहीं, आदर्शों की पुनर्स्थापना है। इसी प्रकार जन्माष्टमी पर हम बाल रूप में भगवान श्री कृष्ण की मनमोहक छवि सजाते हैं। पर यदि अपने बच्चों को कृष्ण बनाना है, तो उन्हें केवल बालकृष्ण या माखनचोर की छवि में सीमित न रखें। उन्हें उस कृष्ण के विषय में भी बताएँ जिन्होंने आगे चलकर धर्म की रक्षा के लिए महाभारत जैसे महायुद्ध को दिशा दी। वही कृष्ण जिन्होंने नीति और राज्यकौशल के नए आयाम स्थापित किए। वही कृष्ण जिन्होंने अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देकर जीवन का गूढ़ रहस्य समझाया। यदि कृष्ण को अपनाना है, तो उनकी बाल लीलाओं के साथ-साथ उनके आदर्शों को भी आत्मसात करना होगा। समस्या प्रतीकों में नहीं, प्राथमिकता में है रंग, पटाखे, झांकियाँ — ये सभी उत्सव के प्रतीक हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब प्रतीक ही पहचान बन जाते हैं और कारण पीछे छूट जाता है। त्योहार केवल आनंद का अवसर नहीं, बल्कि संस्कार और मूल्यों के संवाहक हैं।
यदि हम बच्चों को यह नहीं बताएँगे कि होली क्यों मनाई जाती है, तो वे केवल रंगों का उत्सव स्मरण रखेंगे, सत्य की विजय नहीं।
होली हमें यह संदेश देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न हों, अंततः विजय सत्य और धर्म की ही होती है।
इस होली पर जब आप शुभकामनाएँ दें, तो रंगों के साथ प्रह्लाद की भक्ति और बुराई के अंत का संदेश भी जोड़ें। जब दीवाली आए, तो पटाखों से पहले राम के आदर्शों का स्मरण करें। जब जन्माष्टमी आए, तो केवल बाल लीला नहीं, बल्कि धर्म और नीति का संदेश भी साझा करें। क्योंकि तरीका बदल सकता है,
पर कारण नहीं बदलना चाहिए। आइए, इस बार रंगों से पहले उस संदेश को स्मरण करें।
त्योहारों को मनाने के कारण से जानें,
ना कि केवल मनाने के तरीके से।
क्योंकि रंग फीके पड़ सकते हैं,
पर आदर्शों की छाप पीढ़ियों तक बनी रहती है।




