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अमृतम_जलम  — राजेन्द्र परिहार सैनिक

 

प्रत्येक प्राणी के लिए जल की बूंदें, संजीवनी समान हैं अथवा यूं कह लें कि जल बिन जीवन ही नहीं। अन्न की फसलें सूख जाती हैं जल बिन्दु के अभाव में।

एक बार की बात है कि सुजानपुर में वर्ष भर पानी नहीं बरसा अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी। कुंए, तालाब, जोहड़ नदी सब सूख गए। भोजन बिना कुछ भी खाकर जी सकते हैं पर पानी बिना जीवन की कल्पना करना ही मुश्किल है।सूखे (अकाल) की स्थिति में ग्रामीण दूर इलाकों में पलायनकर गए थे। एक तो मई जून की भीषण गर्मी और प्यास से सूखते कंठ पशु पक्षियों के लिए भयंकर संकट की स्थिति पैदा हो गई थी। एक नीले वर्ण की चिड़िया ने छायादार वृक्ष की शाखाओं पर घौसला बना रखा था। उसके छोटे छोटे बच्चे (चूजे) प्यास से हल्क़ान हुए जा रहे थे। उस अपने प्राणों
से अधिक बच्चों के प्राणों की चिन्ता थी।

मरता क्या न करता! उसने लंबी उड़ान भरी,पंख थक गए थे किंतु एक आस लिए उड़ती चली जा रही थी। सुदूर गांव में एक नल से पानी की बूंदें टपकती हुई नज़र आई, तो उसकी आंखों में जीवन की चमक जाग उठी। आस पास कोई नहीं था। इत्मीनान से उसने टपकती जल बूंदों से अपनी प्यास बुझाई, एक वृक्ष से पत्ता तोड़ लाई और उसका दोना बनाकर उसमें जल भरकर पुनः अपने नीड़ की ओर उड़ चली, बच्चे जल बिन नन्हे नन्हे मुख खोले मां की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसने अपनी चोंच में जल भर भरकर सब बच्चों की प्यास बुझाई। मेरी समझ में यही आया कि एक मां अपने बच्चों के प्राण बचाने हेतु अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करती है।

शिक्षा: जल ही जीवन का आधार है,जल का संरक्षण करें।

राजेन्द्र परिहार सैनिक

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