Uncategorized

मौन प्रेम की मर्यादा — सुनीता तिवारी”सरस”

 

पर जताने का हक़ अब उन्होंने खुद ही अपने हाथों से वापस रख दिया था।
वह अब पास रहकर भी दूर रहने की कला सीख रहे थे-बिना शोर, बिना शिकायत।
कभी जो हर छोटी बात पर मुस्कुरा देते थे, अब वही मुस्कान संजीदा हो गई थी।
बातें कम हो गईं, पर खामोशी में भी एक अपनापन था-जैसे दूर से दिया हुआ आशीर्वाद।
वह उसे देखते तो थे, मगर नज़रों में अब चाहत के साथ संयम भी था।
दिल कहता था
पास जाओ, मगर आत्मा समझाती
यही दूरी उसकी खुशी है।
वह अक्सर खुद से कहते,
मेरा प्यार अगर सच्चा है तो उसे आज़ाद रहना चाहिए
किसी बंधन, किसी उम्मीद, किसी आग्रह के बिना।
अब उन्होंने अपने हिस्से का प्रेम यादों में सहेज लिया था।
वह उसकी हँसी में अपनी खुशी ढूँढते,
उसकी सुकून भरी ज़िंदगी में अपना सुकून।
कभी-कभी अकेले में उसकी यादें दस्तक देतीं,
तो वह मुस्कुरा कर कह देते,
तुम खुश हो, बस यही काफी है।
वह जानते थे, उनका साथ शायद किस्मत में नहीं,
पर उनका प्रेम अधूरा होकर भी अपूर्ण नहीं था।
धीरे-धीरे उन्होंने दूरी को ही अपना दायरा बना लिया,
जहाँ से वह उसे बिना छुए, बिना जताए,
बस चुपचाप प्यार करते रह सके।
और शायद यही प्रेम का सबसे सच्चा रूप था,
जहाँ पाने से ज्यादा,किसी को उसकी दुनिया में मुस्कुराते देखना जरूरी होता है।

सुनीता तिवारी”सरस”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!