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राखी_का_क़र्ज़ – राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

 

राजलक्ष्मी,हां,,यही तो नाम रखा था उस लड़की का घरवालों ने, किंतु एक अत्यंत ही गरीब घर में जन्मी बेटी को सदा निर्धनता और विपन्नता ही देखने को मिली। माता पिता दोनों ही मजदूरी करते थे और बड़ी मुश्किल से घर का गुजारा हो पाता। “न सावन सूखे न भादो हर”वाली कहावत उस पर सटीक बैठती थी। त्यौहार आते और चले जाते। उसकी ज़िन्दगी में ना त्योहार पर कोई खुशी आती थी,ना ही उसे उम्मीद थी कि खुशी कभी जीवन में मिल पाएगी। बेबस मां बाप लाचार थे। जब उन्हें ही खुशियों के दर्शन नहीं हुए

कभी तो वे भला बेटी को खुश कैसे रख पाते??

सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यह था कि वो इकलौती थी।भाई,बहन कोई था नहीं जिसके साथ खेल सके,या दुःख दर्द बांट सकें,ऊपर से ज़ाहिल मां के ताने,ज़हर बुझे तीर उसके हृदय के आर पार हो जाते थे। चाहे अनचाहे भी वक्त गुजरता रहा,और राजलक्ष्मी अब किशोरावास्था की दहलीज़ पर कदम रख चुकी थी।
अब उसके ब्याह को लेकर ताने शुरू हो चुके थे! जैसे उसने लड़की रूप में जन्म लेकर जघन्य अपराध किया हो।आज रक्षाबंधन का त्योहार था। चारों तरफ रौनकें थी, सिर्फ उसी के घर में मातम पसरा था। वो एक राखी खरीद लाई थी और भाई नहीं होने से उदासी के आंसू छलक पड़े, वो दहलीज़ से बाहर बने नीम के नीचे चबूतरे पर बैठ गई,आंसुओं की गंगा यमुना थमने को तैयार ही नहीं थी। अचानक एक २३-२४ साल का जवान फौजी बाइक पर उसके सामने खड़ा नज़र
आई। लड़की भयभीत होकर अंदर जाने वाली थी कि फौजी जवान बोला “बहन डर मत! मुझे अपना भाई ही समझ ले।मेरे कोई बहन नहीं है,”क्या तुम मुझे राखी बांधोगी.?? फौजी की आंखों में भी आंसू छलक पड़े थे। राजलक्ष्मी को थोड़ी झिझक महसूस तो हुई लेकिन भैया!! कहकर उसने फौजी को राखी बांध दी।बहन अब जरा हंसकर तो दिखा,,बहन के चेहरे पर उदासी मिश्रित हंसी उभर आई। भाई ने कहा “चिन्ता मत कर!! अब तेरा भाई तुझे दुखी नहीं होने देगा। यह कहकर उसने बहन को उपहार में कुछ रुपए देने चाहे,बहन ने मना किया पर जब उसने कहा कि इसका अर्थ यह है कि तुमने मुझे भाई नहीं माना है! नहीं भैया! मैंने तुझे सच्चे हृदय से भाई माना है। कुछ महीनों बाद ही राजलक्ष्मी की शादी तय हो गई! अपने भाई के पास उसने इसकी सूचना भिजवा दी थी। माता पिता को भी पता चल चुका था कि इसने किसी फौजी को भाई माना है। ऐन शादी के वक्त पर भाई चला आया और शादी, दहेज का सारा खर्च और एक भाई का हर फ़र्ज़ निभाया। राजलक्ष्मी को वास्तव में उसने राजलक्ष्मी बना दिया था। वो फूली नहीं समा रही थी और मां पिता भी बहुत खुश थे। इस तरह से फौजी जवान ने राखी का क़र्ज़ और फ़र्ज़ दोनों अदा कर दिए थे।

राजेन्द्र परिहार “सैनिक”

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