शिक्षक दिवस पर स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान ने किया शिक्षकों का सम्मान
जीवन एक पाठशाला’ विषय पर सजे काव्य-सृजन के रंग, उत्कृष्ट रचनाकार हुए सम्मानित

सुनितात्रिपाठी’अजय नज़र इंडिया संवाद
जयपुर। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम का पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के अंधकार में ज्ञान का दीप जलाने वाला वह प्रकाश-स्तंभ है, जो पीढ़ियों को संस्कार, संवेदना और सही दिशा प्रदान करता है। इसी भावभूमि को केंद्र में रखते हुए स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान द्वारा शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में जयश्री ज्वैलर्स के सौजन्य से शिक्षकों के सम्मान एवं साहित्यिक कार्यक्रम का गरिमामय आयोजन सलोनी क्षितिज के गरिमामय संचालन से प्रारंभ हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की सुरमयी आराधना से हुआ। ज्ञानवती जी द्वारा रचित सरस्वती वंदना को अनुराधा माथुर ने मधुर स्वर देकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। रेखा गुप्ता जी ने श्लोकों के माध्यम से गुरु चरणों में ज्ञान, विवेक और सृजन की मंगलकामना के साथ कार्यक्रम को ऊंचाई दी।
उपस्थित अतिथियों का स्वागत संस्थान के पदाधिकारियों द्वारा आत्मीयता, माला एवं शॉल से किया गया।
संस्था परिचय प्रस्तुत करते हुए ज्ञानवती जी ने स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान की साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने जीवन को एक ऐसी पाठशाला बताया, जहाँ हर अनुभव एक नया अध्याय और हर रिश्ता एक नया पाठ पढ़ाता है। उनके शब्दों में..
“जीवन की पाठशाला में रिश्तों की वर्णमाला को पढ़ा…”
ने उपस्थित साहित्यप्रेमियों को गहरे तक स्पर्श किया।
कार्यक्रम में ‘जीवन एक पाठशाला’ विषय पर आयोजित काव्यपाठ में रचनाकारों ने अपनी-अपनी संवेदनाओं, जीवनानुभवों और दार्शनिक दृष्टि के माध्यम से विषय को विविध आयाम प्रदान किए। एक से बढ़कर एक रचनाओं ने सभागार को कभी चिंतन, कभी संवेदना और कभी उत्साह से भर दिया।
नीता भारद्वाज ने “माँ देती पहली शिक्षा…” शीर्षक रचना के माध्यम से माँ को जीवन की प्रथम गुरु के रूप में स्मरण किया। पूजा शर्मा की मार्मिक कविता ने श्रोताओं को भावुक कर दिया और सभागार में संवेदना की लहर दौड़ गई। भँवर सिंह जी के गीत “जीवन ना मधु का प्याला है…” ने जीवन के यथार्थ और उसके विविध रंगों को स्वर दिया और उपस्थित जनों को भावविभोर कर दिया।
पंकज सोनी जी ने “जिंदगी हर पल कुछ नया सिखलाती है” के माध्यम से जीवन की सतत सीख और परिवर्तनशीलता को रेखांकित किया। सुशीला शर्मा ने जीवन के नवरसों को अपनी कविता में पिरोते हुए आह्वान किया—
“आओ मिलकर नवरसपान करें।”
प्रियंका पुरोहित की कविता “ज्ञान के झरोखे में ज्योति बनकर आते गुरुवर” ने गुरु की महिमा को उजास प्रदान किया। वंदना सक्सेना ने “शिक्षक अनमोल किरदार है, डूबती नैया पार लगा दे” के माध्यम से शिक्षक की भूमिका को जीवन-नाव के कुशल खेवनहार के रूप में प्रस्तुत किया।
स्नेहलता सहाय जी ने गुरु दत्तात्रेय के जीवन-दर्शन का उल्लेख करते हुए बताया कि सीखने की दृष्टि हो तो चींटी जैसे छोटे जीव से भी गुरु की भूमिका में जीवन का कोई महत्वपूर्ण पाठ ग्रहण किया जा सकता है। डॉ. नेहा पारीक ने “पहला पाठ व्यर्थ न जाए” के माध्यम से अन्न के एक-एक कण की महत्ता और भोजन की बर्बादी रोकने का सार्थक संदेश दिया। नीता टहलियानी ने भी प्रभावपूर्ण काव्यपाठ से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
कार्यक्रम में कुसुम दी ने अपने सारगर्भित संदेश के माध्यम से शिक्षक की भूमिका, जीवन-मूल्यों और साहित्य की सामाजिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। दुर्गा प्रसाद सर ने शिक्षकों की महत्ता पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि शिक्षक समाज की भावी पीढ़ी के निर्माण का आधार हैं। रावत सर ने शिक्षकों की गरिमा और उनके उत्तरदायित्व को रेखांकित करते हुए प्रेरक उद्बोधन दिया। सुधीर “सुधि” जी के शब्दों में गागर में सागर सी गहराई थी।
इस अवसर पर जयश्री ज्वैलर्स की मार्केटिंग हेड रिमझिम ने अपने संस्थान की विभिन्न योजनाओं एवं सुविधाओं की जानकारी साझा की। उन्होंने साहित्यिक एवं सामाजिक गतिविधियों के प्रति संस्थान की प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सराहना की। जयश्री ज्वैलर्स की ओर से मंचस्थ अतिथियों को स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
काव्य प्रतियोगिता के परिणाम
‘
जीवन एक पाठशाला’ विषय पर आयोजित काव्य प्रतियोगिता में रचनाकारों की उत्कृष्ट प्रस्तुतियों के आधार पर परिणाम घोषित किए गए।
प्रथम स्थान — नीता भारद्वाज, भँवर सिंह, पूजा शर्मा
द्वितीय स्थान — पंकज सोनी, सुशीला शर्मा, श्याम पुरोहित
तृतीय स्थान — अतिशा माथुर, प्रियंका पुरोहित
सांत्वना पुरस्कार — सलोनी, स्नेहलता सहाय, वंदना सक्सेना एवं डॉ. नेहा पारीक।
सहभागिता प्रमाणपत्र — अनुराधा माथुर एवं राधा गुप्ता को प्रदान किए गए।
पूर्व आयोजित प्रतियोगिताओं के परिणाम भी घोषित
कार्यक्रम में रक्षाबंधन पर्व पर आयोजित “एक हजारों में मेरी बहना है” प्रतियोगिता के परिणाम भी घोषित किए गए। रक्षाबंधन वीडियो प्रतियोगिता में नीता टहलियानी को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया। आशा बागोरिया एवं अनुराधा माथुर ने द्वितीय तथा तरुणा सिंघल ने तृतीय स्थान प्राप्त किया।
इसी क्रम में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित “ऐ वतन तेरे लिए” प्रतियोगिता के परिणाम भी घोषित किए गए।
प्रथम स्थान — नीता टहलियानी, नीता भारद्वाज एवं प्रियंका पुरोहित
द्वितीय स्थान — सलोनी एवं वंदना सक्सेना
तृतीय स्थान — कुमकुम माथुर एवं अनुराधा माथुर।
कार्यक्रम के मंचस्थ अतिथियों ने अपने प्रेरक उद्बोधनों के माध्यम से शिक्षक की भूमिका को केवल शिक्षा प्रदान करने तक सीमित न मानते हुए उसे चरित्र-निर्माण, संस्कार-सृजन और समाज-निर्माण की महत्वपूर्ण धुरी बताया।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में डॉ. रमा सिंह ने अपने अध्यापन काल से जुड़े चुटीले एवं रोचक संस्मरण साझा किए। उनके संस्मरणों ने सभागार में हास्य और आत्मीयता का वातावरण निर्मित कर दिया। उन्होंने अपने अनुभवों के माध्यम से शिक्षक जीवन की चुनौतियों, विद्यार्थियों से जुड़े मधुर प्रसंगों और अध्यापन की अविस्मरणीय स्मृतियों को जीवंत कर दिया।
अंत में सुभाष सक्सेना जी ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों, प्रतिभागियों, सहयोगियों एवं जयश्री ज्वैलर्स का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम केवल सम्मान समारोह बनकर नहीं रहा, बल्कि गुरु-गरिमा, साहित्य-सृजन, जीवन-मूल्यों और सामाजिक सरोकारों का सुंदर संगम बनकर उपस्थित जनों की स्मृतियों में अंकित हो गया।
स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान का यह आयोजन इस संदेश के साथ संपन्न हुआ कि..
जीवन सचमुच एक पाठशाला है; यहाँ समय शिक्षक है, अनुभव पाठ हैं, रिश्ते वर्णमाला हैं और गुरु वह दीपक हैं, जिसकी रोशनी में जीवन अपने अर्थ खोजता है।




